इंद्रियाणमनुत्सर्गों मृत्यु नापि विशिष्यते । अत्यर्थम् पुनरुतसर्ग: सादयेद् दैवतानपि ।। – विदुर नीति अर्थात इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्ति मृत्युसे भी अधिक कठिन है और विषयोंमें अत्यधिक प्रवृत्ति तो देवोंको भी नष्ट कर सकती है । अपने मनको नियन्त्रित करना अर्थात विषयोंके प्रति अनासक्त करना, इसीको साधना कहते हैं । यह प्रक्रिया अत्यधिक कठिन है और […]
आजकल अनेक व्यक्ति भोजनको झूठा छोड देते हैं, वह एक प्रकारसे ब्रह्म रुपी अन्नका अपमान करना है । भोजनमें मीनमेख निकालनेसे भी भोजनकी अवमानना होती है, जो प्राप्त हुआ है, उसे कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करनेसे भोजनसे सभी देहोंका पोषण होता है…..
प्राचीनावीतिना सम्यगयप्तव्यमतन्द्रिणा । पित्र्यमा निधनान् कार्यं विधिवद्दर्भयाणिना ॥ – मनुस्मृति (३:२८०) अर्थात पुत्रको जीवन भर श्राद्ध-तर्पण आदि कर्म करने चाहिए । उसे इस हेतु सदैव दाहिने कंधेपर यज्ञोपवित रखकर, आलस्य रहित होकर हाथमें कुशाएं लेकर तथा बाईं ओर होकर श्रद्धाके साथ शास्त्र विधिका अनुसरण करना चाहिए । इस शास्त्र वचनका उल्लंघन करनेके कारण आजके अनेक […]
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चन्द्रक्षयेsग्निमान् । पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकं ।। – मनुस्मृति (२:१२२) अमावस्याकी तिथिको पितृ श्राद्धकर प्रति माह पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्ध करना एक गृहस्थ ब्राह्मणका कर्तव्य है । आज अनेक जन्मब्राह्मण शास्त्रोक्त धर्माचरण नहीं करते; परिणामस्वरूप उनके घरमें तीव्र स्तरका पितृदोष पाया गया है । मनुस्मृतिके इस श्लोकके आधारपर सभी पुरुष, जो जन्मब्राह्मण हैं, वे चिंतन […]
पुत्र अपने पितरोंका ‘पु’ नामक नरकसे रक्षण करता है; इसलिए उसे स्वयं ब्रह्मदेवने ही ‘पुत्र’ कहा है । इस श्लोकके अनुसार पितरोंको सद्गति प्राप्त हो, उन्हें यातनाओंसे मुक्ति मिले व पितृलोकसे पितर अपने वंशपर कृपादृष्टि रखें, इस हेतु पुत्र श्राद्ध आदि विधियां करें । इससे स्पष्ट होता है कि स्वयंको पुत्र माननेवालोंका यह कर्तव्य ही है; किन्तु ‘कलियुगी पुत्र’ अपने हित हेतु सर्व कर्म करता है………
आत्मज्ञानी व्यक्ति मात्र आध्यात्मिक प्रगति करवानेका सामर्थ्य नहीं रखते हैं, अपितु वे लौकिक सुख-साधनोंको भी देनेका सामर्थ्य रखते हैं; अतः गृहस्थोंको अपने तीन तापोंसे (आधिभौतिक, आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक) मुक्ति हेतु ऐसे आत्मज्ञानीके शरण जाने हेतु बताया गया है…..
ज्येष्ठत्वं जन्मना नैव गुणैज्र्येष्ठत्वमुच्यते । गुणात् गुरुत्वमायाति दुग्धं दधि घॄतं क्रमात् ।। अर्थात् जन्मसे श्रेष्ठता नहीं आती है, महानता सदगुणोंको आत्मसात करनेसे आती है । गुणोंमें बढोतरीके कारण श्रेष्ठतामें उत्तरोत्तर प्रभाव वैसे ही बढता है जैसे दुग्धसे दहीका और दहीसे मक्खन और घीका ! हमारे यहांके वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित नहीं अपितु गुण-कर्म आधारित थी […]
कुछ लोग पूछते हैं कि सज्जन और दुर्जनकी क्या परिभाषा क्या है ? उनके उत्तरके अनेक शास्त्र वचनोंमें यह शास्त्र वचन उनके उत्तरका कुछ अंश अवश्य इंगित करता है । विद्या विवादाय धनम् मदाय, शक्तिः परेशाम् परपीडनाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतद ज्ञानाय, दानायचरक्षणाय ॥ अर्थ : विद्या विवादके लिए, धन मदके लिये, शक्ति दूसरोंको सतानेके […]
स्गुणेषु क्रियतां यत्न: किमाटोपै: प्रयोजनम् । विक्रीयन्ते न घण्टाभि: गाव: क्षीरविवर्जिता: ।। अर्थ : स्वयंमें अच्छे गुणोंकी वृद्धि करनी चहिए । प्रदर्शन करके कोई लाभ नहीं होता । दुध न देनेवाली गाय उसके गलेमें लटकी हुअी घंटी बजानेसे वह बेची नहीं जा सकती ।
धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ अर्थ : धर्मके दस लक्षण हैं – धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना । भावार्थ : जो धार्मिक या साधक बनना चाहते हैं, उन्होंने धर्मके इन दस लक्षणोंको आत्मसात करना चाहिए । इन्हें अच्छेसे स्मरणकर, इसके विपरीत […]