शास्त्र वचन

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नाहारं चिन्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत् । आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते ।। – चाणक्य नीति अर्थ : ज्ञानी अपने आहारकी चिंता नहीं करता, मात्र धर्मका चिंतन करता हैं; क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि उसके आहारका नियोजन उसके जन्मके समय ही हो जाता है।

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सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः । विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ।। अर्थ : संतोष सबसे बडा लाभ है, अच्छी संगत परम गति है, सुविचार(विवेकद्वारा चिंतन) सबसे बडा ज्ञान है और शांति सबसे बडी सुख है !

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सुखस्य दु:खस्य न कोऽपि दाता । परो ददाति इति कुबुद्धिरेषा । अहं करोमि इति वृथाभिमान: । स्वकर्मसूत्रै: ग्रथितोऽहि लोक: ।। – अध्यात्म रामायण  अर्थ : हमें कोई सुख या दुःख नहीं देता । अज्ञानी यह सोचते हैं कि किसी औरके कारण हमें सुख और दुःख मिला  है । उसी प्रकार यह सोचना कि अपने प्रयासोंसे […]

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यः पठति लिखति पश्यति , परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति। तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी , दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥                                                अर्थ : जो पढता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानोंका आश्रय लेता है, उसकी […]

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गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् । वर्तमानेन  कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥                  अर्थ : बीते हुए समयका शोक नहीं करना चाहिए और भविष्यके लिए चिन्तित नहीं होना चाहिए, बुद्धिमान तो वर्तमानमें ही रहते हैं ॥

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गुरु शुश्रूषया विद्या पुष्कलेन् धनेन वा। अथ वा विद्यया विद्या चतुर्थो न उपलभ्यते॥ अर्थ : विद्या गुरुकी सेवासे, पर्याप्त धन देनेसे अथवा विद्याके आदान-प्रदानसे प्राप्त होती है । इसके अतिरिक्त विद्या प्राप्त करनेका चौथा तरीका नहीं है॥

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आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते । नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥ अर्थ : आयुका एक क्षण भी सारे रत्नोंको देनेसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है;  अतः इसको व्यर्थमें नष्ट कर देना महान असावधानी है।

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क्षमा बलमशक्तानाम् शक्तानाम् भूषणम् क्षमा । क्षमा वशीकृते लोके क्षमयाः किम् न सिद्ध्यति॥ अर्थ : क्षमा निर्बलोंका बल है, क्षमा बलवानोंका आभूषण है, क्षमाने इस विश्वको वशमें किया हुआ है, क्षमासे कौन सा कार्य सिद्ध नहीं हो सकता है ?

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न चोराहार्यम् न च राजहार्यम्  न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं  विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥ अर्थ : जिसे न चोर चुरा सकते है, न राजा हरण कर सकता है, न भाइयोंमें बांटा जा सकता है, जो न भार स्वरुप ही है, जो नित्य व्यय करनेपर भी बढता है, ऐसी विद्यारुपी धन सभी धनोंमें […]

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रिक्तपाणीर्नपश्येत राजानं दैवतं गुरुम् । दैवज्ञं पुत्रकं मित्रं फलेन फलमादिशेत् ।। अर्थ : राजा, गुरु, विद्वान, अध्यात्मविद, बालक एवं मित्रके यहां रिक्त हाथ नहीं जाना चाहिए। फलकी अपेक्षा फलसे करें।

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