न्यायोपार्जित वित्तस्य दशमांशेन धीमत: । कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरं प्रीत्येर्थमेव च । -स्कंदपुराण अर्थ : धर्मके मार्गसे अर्जित धन भी तभी शुद्ध होता है जब निस्वार्थ भावसे दशांशका त्याग, ईश्वरीय कार्य हेतु निवेदित किया जाये।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।। – कठोपनिषत् अर्थ : स्वयंको एक यात्री समान समझें और इस देहको एक रथ समान । मनके डोर बुद्धिके हाथमें डालें और बुद्धिको सारथी मानें ।
अजातपक्षा इव मातरं खगाः । स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता: ।। प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा । मनोsरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ।। – श्रीमद् भागवत पुराण अर्थ : जैसे पक्षियोंके पंखहीन बच्चे अपनी मांकी प्रतिक्षा करते हैं, जैसे भूखे बछडे अपनी मांके दूध पीनेके लिए आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतमसे मिलनेके लिए व्याकुल […]
अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा । कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ ।। – श्रीगुरु गीता अर्थ : अद्वैतकी स्थिति सर्वकाल, सर्व परिस्थितिमें अनुभूत कर सकते हैं; परंतु श्रीगुरुके संदर्भमें कदापि ऐसा नहीं करना चाहिए अर्थात श्रीगुरुके प्रति कृतज्ञता एवं सेवाभाव सदैव होना चाहिए अर्थात द्वैत भावमें आकर श्रीगुरुकी सेवा करना चाहिए।
अद्भिः गात्राणि शुध्यन्ति मन: सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिज्र्ञानेन शुध्यति ।। – मनुस्मृति अर्थ : जल मात्र स्थूल देहको शुद्ध करता है, सत्य मनको पवित्र करता है, विद्या और तप जीवात्माको शुद्ध करती है और ज्ञान बुद्धिको शुद्ध करती है ।
सुखं आत्यांतिकं यत् तत् बुद्धिग्राह्यं अतीद्रियं । यं लब्वा आत् चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत: ।। अर्थ : जिस सुखको शरीरके अंगोंके माध्यमसे नहीं प्राप्त किया जा सकता है और उस सुखकी अनुभूति लेनेके पश्चात और उसकी बुद्धिसे कुछ सीमा तक प्रचीति लेनेपर अन्य किसी भी प्रकारके सुखको पानेकी इच्छा शेष नहीं रहती उसे ही […]
अग्निशेषमृणशेषं शत्रुशेषं तथैव च । पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्माच्शेषं न कारयेत् ।। अर्थ : यदि अग्नि, ऋण और शत्रुका अंश मात्र भी अवशेष रह जाये तो उनकी वृद्धि पुनः पुनः होती है अतः इनमेंसे किसीको भी अंश मात्र शेष न रहने दें !
विद्वत्वं च नॄपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन । स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।। अर्थ : विद्वत्व और नृपत्वकी कभी तुलना नहीं की जा सकती है। राजा अपने देशमें पूजा जाता है और विद्वान अपनी विद्वता रूपी गुणके कारण, सर्वत्र पूजा जाता है।
मुर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम् । दंपत्यो कलह: नास्ति तत्र श्री: स्वयमागत: ।। अर्थ : जहां मूर्खोंकी पूजा नहीं होती है अर्थात जहां निर्णयप्रणालीमें मूर्खोंसे राय नहीं ली जाती है, जहां धान्यका योग्य प्रकारसे संचय किया जाता हो, जहां पति-पत्नीमें क्लेश नहीं होता वहां समृद्धि (लक्ष्मी) विराजती है।
अन्नदानं परं दानं विद्यादानं अत: परम् । अन्नेन क्षणिका तॄप्ति: यावज्जीवं च विद्यया ।। अर्थ : अन्नदान श्रेष्ठ दानमें आता है; परंतु विद्यादान उससे भी श्रेष्ठ है। अन्नसे क्षणिक तृप्ति होती है और विद्या आजीवन साथ रहती है। अतः विद्यादान, सर्वश्रेष्ठ दान है। अन्नदान अर्थात जो भूखे हैं, उन्हें तृप्त करना […]