न जातु कामान्न भयान्न लोभात् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो: | नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये नित्यो जीवो धातुरस्य त्वनित्य: || – महाभारत […]
संग्रहैकपर: प्राय: समुद्रोपि रसातले । दातारं जलदं पश्य गर्जन्तं भुवनोपरी ।। अर्थ : जलका संग्रह […]
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदा:। शत्रुबुद्धि विनाशाय दीपज्योतिर्नमोस्तुते ।। अर्थ : मंगलकारी, शुभदात्री, आरोग्य एवं धनसंपदा देनेवाली हे दियाकी ज्योति आपको नमन है , आप हमारे शत्रुके विनाशकारी बुद्धिका नाश करें।
नात्मच्छिद्रं रिपुर्विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु । गूहेत्कूर्म इवाङ्गनि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ – महाभारत १२.१४०.२४ अर्थ : स्वयंके मर्मस्थान शत्रुको नहीं समझमें आने चाहिए; परंतु शत्रुके मर्मस्थान ढूंढ कर निकालना चाहिए । कछुआ जिस प्रकार अपने सर्व अवयय अपने शरीरमें छुपाकर रखता है […]
यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धे: परं गत: । तावुभौ सुखमेधेते क्लिशत्यन्तदरितो जन: ।। अर्थ : इस जगतमें दो प्रकारके मनुष्य आनंदी रहते हैं – जो पूर्णत: अज्ञानी हो और दूसरा वे जिनका बुद्धिलय हो गया हो अर्थात उनकी बुद्धि विश्वबुद्धिसे एकरूप हो गयी हो; शेष सभी अधिकांशत: दु:खको अनुभव करते रहते हैं ।
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत् ।गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम् ।। – श्री गुरुगीता अर्थ : गुरु चरणोदकको ग्रहण करनेसे जो फल प्राप्त होता है उसके सहस्रांश समान पुण्य भी सप्त सागर और तीर्थोंमें स्नान करनेसे नहीं मिलता ।
येषां न विद्या न तपो न दानं न चापि शीलं न गुणो न धर्मः । ते मृत्योलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।। – चाणक्य नीति अर्थ : जिनमें न विद्या है, न तप है, न दान है, न शील है, न गुण है और न ही धर्म ही है, वे इस लोकमें मनुष्य रूपमें पशु […]
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखं । धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ।। – वाल्मिकि रामायण, अरण्यकाण्ड ९:३० अर्थ : धर्मसे ही धन मिलता है और धर्मसे ही सुख मिलता है । अधिक क्या धर्मसे ही सब कुछ मिल जाता है; अतः इस विश्वमें धर्म ही सार-सर्वस्व ग्राह्य वस्तु है ।
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ।। – चाणक्य नीति अर्थ : जो निश्चितरूपसे प्राप्त होनेवाला हो उसे छोडकर अनिश्चितकी ओर भागता है उसे जो निश्चित प्राप्त होनेवाला था वह भी नहीं मिलता और अनिश्चित तो वैसे भी अप्राप्य ही रहता है अर्थात दोनों में कुछ भी प्राप्त नहीं […]
श्रुत्वा धर्मम्विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् । श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात् ।। – चाणक्य नीति अर्थ : धर्मका श्रवण करनेसे जानकारी मिलती है, धर्मके ज्ञानसे कुमति दूर होती है, धर्मका चिंतन करनेसे अज्ञानता दूर होती है और धर्मका अध्ययन करनेसे मोक्ष मिलता है !