अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोंपसेविन: । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विध्या यशोबलं ।। अर्थ : वयोवृद्धका अभिवादन करनेवाले मनुष्यकी और नित्य वृद्धोंकी सेवा करनेवाले मनुष्यकी आयु, विद्या यश और बल, ये चारों बढते हैं ।
ऋषभांष्चापि जानामि राजनपूजितलक्षणान् । येषां मूत्रामुपाघ्राय अपि बन्ध्या प्रसूयते ।। – महाभारत, विराटपर्व अर्थ: उत्तम लक्षणवाले उन बैलोंका भी मुझे अभिज्ञान (पहचान) है, जिनके मूत्रको सूंघ लेने मात्रसे बंध्या स्त्री गर्भ धारण करने योग्य हो जाती है ।
पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः । कण्डनी चोदकुम्भश्च वध्यते यास्तु वाहयन् ।। – मनुस्मृति ३:६८ अर्थ : चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली तथा पानीका घडा गृहस्थियोंके ये पञ्च हिंसाके स्थान हैं, जिनको प्रयोगमें लाते हुए अनेक जीवोंका संहार होता है, जिससे गृहस्थ व्यक्ति हिंसाके पापसे बन्ध जाता है । तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः । पञ्च […]
सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥ अर्थ : सब प्राणियोंकी प्रवृत्ति सुखके लिए होती है (एवं) बिना धर्मके सुख मिलता नहीं । इसलिए, तू धर्मपरायण बन ।
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः । तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ।। अर्थ : घिसने, काटने, तपाने और पीटने, इन चार प्रकारोंसे जैसे सोनेका परीक्षण होता है, उसी प्रकार त्याग, शील, गुण एवं कर्मोंसे पुरुषकी परीक्षा होती है ।
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः । पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसे वसेत ॥ अर्थ : जहां कोई सेठ, वेदपाठी विद्वान, राजा, नदी और वैद्य न हो, इन पांच स्थानोंपर एक दिन भी नहीं रहना चाहिए ।
चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत् करिष्यति । तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत ॥ अर्थ : चिन्ता और उद्वेगमें संयम रखकर और ऐसा मानकर कि श्रीहरि जो भी करेंगे, वह उनकी लीला मात्र है, चिन्ताको शीघ्र त्याग दें !
योगेन चितस्य पदेन वाचां । मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ॥ यो पाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां । पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोस्मि ॥ अर्थ : वाणीमें अशुद्धता न रहे, वाणी शुद्ध हो जाए, शब्दोंका मर्म समझमें आ सके, शब्दोंका सामर्थ्य समझमें आ सके, इसलिए […]
जन्मदुःखं जरादुःखं मृत्युदुःखं पुनः पुनः । संसार सागरे दुःखं तस्मात् जागृहि जागृहि ॥ अर्थ : संसारसागरमें जन्मका, बुढापेका और मृत्युका दुःख बार-बार आता है; इसलिए (हे मानव !), “जाग, जाग !”
एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। अर्थ : जो अपने पितरोंको तिल-मिश्रित जलकी तीन-तीन अंजलियां प्रदान करते हैं, उनके जन्मसे तर्पणके दिनोंतकके पापोंका नाश हो जाता है ।