यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम् । तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ अर्थ : कोई वस्तु चाहे कितनी ही दूर क्यों न हो, उसका मिलना कितना ही कठिन क्यों न हो और वह पहुचंसे बाहर ही क्यों न हो ?, कठिन तपस्या अर्थात परिश्रमसे उसे भी प्राप्त किया जा सकता है । […]
पुण्यंप्रज्ञावर्धयतिक्रियमाणंपुन: पुन: । वृद्धप्रज्ञ: पुण्यमेवनित्यमारभतेनर: ॥ – विदुर नीति अर्थ : बार-बार क्रियमाणद्वारा पुण्य करनेसे मनुष्यकी प्रज्ञा बढती है और जिसका विवेक जाग्रत होता है, ऐसा व्यक्ति सदैव पुण्य कर्म करता है ।
पापंप्रज्ञानाशयतिक्रियमाणंपुनःपुनः। नष्टप्रज्ञःपापमेवनित्यमारभतेनरः॥ – विदुर नीति अर्थ : बार-बार क्रियमाणद्वारा पाप करनेसे मनुष्यकी विवेकबुद्धि नष्ट हो जाती है और जिसकी विवेकबुद्धि नष्ट हो चुकी हो, ऐसे व्यक्तिसे सदैव पापकर्म होते हैं ।
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटा भसमलेपनैः ॥ अर्थ : जिस मनुष्यका हृदय सभी प्राणियोंके लिए दयासे द्रवीभूत हो जाता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटा, भस्मलेपन आदिसे क्या लेना ?
न हीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु वर्तते । दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक ॥ अर्थ : प्राणियोंके प्रति दया, सौहार्द, दानकर्म एवं मधुर वाणीके व्यवहारके जैसा कोई वशीकरणका साधन तीनों लोकोंमें नहीं है ।
नैकयान्यस्त्रिया कुर्याद् यानं शयनमासनम् । लोकाप्रासादकं सर्वं दृष्ट्वा पृष्ट्वा च वर्जयेत् ॥ अर्थ : अकेली पराई स्त्रीके साथ-साथ वाहनपर बैठने, लेटने और आसन ग्रहण करनेका कार्य न करें ! ध्यानसे देखकर तथा औरोंसे पूछकर उन बातोंको टालें, जो सामान्य लोगोंको अप्रिय लगती हों ।
नैकयान्यस्त्रिया कुर्याद् यानं शयनमासनम् । लोकाप्रासादकं सर्वं दृष्ट्वा पृष्ट्वा च वर्जयेत् ॥ अर्थ : अकेली पराई स्त्रीके साथ-साथ वाहनपर बैठने, लेटने और आसन ग्रहण करनेका कार्य न करें ! ध्यानसे देखकर तथा औरोंसे पूछकर उन बातोंको टालें, जो सामान्य लोगोंको अप्रिय लगती हों ।
जरा रूपं हरति धैर्यमाशा मॄत्यु: प्राणान् धर्मचर्यामसूया । क्रोध: श्रियं, शीलमनार्यसेवा ह्रियं काम: सर्वमेवाभिमान: ॥ अर्थ : वृद्धावस्था सुन्दरताका, धैर्य इच्छाओंका, मृत्यु प्राणोंका, धर्मका आचरण अपवित्रताका, क्रोध प्रतिष्ठाका, चरित्र बुरी संगतिका, लज्जा कामका और अभिमान सबका नाशकर देता है ।
स हि भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला । मनसि च परितुष्टे कोर्थवान् को दरिद्र: ॥ अर्थ : जिसकी इच्छाएं विशाल हैं, वह ही दरिद्र है । मनके सन्तुष्ट हो जानेपर, कौन धनी है और कौन निर्धन ?
पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नतः । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ।। अर्थ : हे भरतश्रेष्ठ ! पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु, मनुष्यको इन पांच अग्नियोंकी बडे यत्नसे सेवा करनी चाहिए ।