धर्मयुद्ध प्रारम्भ है, अतः हिन्दुओंको साधना बढाना आवश्यक ‘अभी धर्मयुद्ध प्रारम्भ हुआ है । यह भक्तिका युद्ध है । आसुरी शक्ति तथा दुर्जन, हिन्दू देवी-देवताओंकी विडम्बना कर, हिन्दू धर्मका द्वेषकर ‘विरोधी भक्ति’ कर रहे हैं । हम हिन्दुओंने धर्माभिमान बढानेके साथ-साथ साधना कर, ईश्वरकी नवधा (नवविधा भक्ति) करनी चाहिए । अपनी भक्ति असुरोंकी विरोधी भक्तिसे […]
अनुभूति १. प्रत्येक व्यक्तिको उसके स्तरानुसार उस-उस तत्त्वकी अनुभूति होती है; इस कारण सभीको एक जैसी अनुभूति नहीं होती है, अपितु भिन्न-भिन्न अनुभूतियां होती हैं । २. कालानुसार कोई तत्त्व अधिक कार्यरत होता है तब उस तत्त्वकी अनुभूतियां होती हैं । – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
‘वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं धार्मिक विषयोंके सम्बन्धमें सभी प्रश्नोंकी ओर मानसिक अथवा बौद्धिक दृष्टिसे नहीं; अपितु आध्यात्मिक दृष्टिसे देखना सीखें, तभी कार्यकारण भाव तथा उपाय समझमें आएंगे एवं यश प्राप्त होगा ।
हिन्दू राष्ट्रमें वृद्धाश्रम नहीं होंगे; क्योंकि साधनारत बालक आजके बालकों समान कृतघ्न नहीं होनेके कारण वे अपने माता-पिताका प्रेमपूर्वक ध्यान रखेंगे ! – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
सीखनेसे नहीं अपितु सेवा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करनेके कारण आनन्द प्राप्त होता है ! सीखनेमें आनन्द नहीं होता है; वह बौद्धिक सुख होता है । सेवा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करनेके कारण आनन्द मिलता है; अतः मुझे नवीन कुछ सीखने हेतु नहीं मिला, यह दुख करनेकी अपेक्षा, मुझे मिली सेवा मैं परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करता हूं […]
विवाहप्रसंगमें वरपक्षसे वधूपक्ष कई बार कनिष्ठ समझा जाता है । प्रत्यक्षमें यह विपरीत है । दाता श्रेष्ठ होता है । अतः कन्यादान करनेवाला वधू-पिता, वर-पितासे श्रेष्ठ होता है । लेनेवालेका हाथ भी देनेवालेके हाथसे नीचे अर्थात कनिष्ठ स्तरपर होता है । प्रत्यक्षमें दोनों पक्षोंने एक-दूसरेको समान समझना उचित होगा । – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, […]
गलेतक पानी आ जानेके पश्चात मैं तैरना सीख रहा हूं, ऐसा कहनेवाला जीवित नहीं बचता, यही स्थिति हिन्दुओंकी होनेवाली है । अब हिन्दुओंका अस्तित्व समाप्त होनेकी स्थितिमें होते हुए भी हिन्दुओंको अंशमात्र भी चिन्ता नहीं । हिन्दुओ ! इस वृत्तिको परिवर्तित कर अब शेष बचे हुए १-२ वर्षोंके अल्प कालमें तो क्षात्रधर्म साधना सीख लें […]
‘निरक्षरोंका ऐसा कहना है कि सभी भाषाओंके अक्षर समान होते हैं अथवा सब कानून और औषधियां एक समान होती हैं’; जिसप्रकार ये मानना अज्ञानताका द्योतक है, उसीप्रकार ‘सर्वधर्म समभाव’ मानना भी है ।’ – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/
‘बुद्धिवादी अपनी अंधश्रद्धाके कारण श्राद्ध इत्यादि कुछ नहीं करते हैं । जिसके कारण उनके पूर्वज उसी योनिमें सैकडों वर्षों तक फंसे रहते हैं ।’