श्रीगुरु उवाच

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दूसरे संगठन कार्यकर्ताओंको, ‘कोई पद देकर अपने संगठनमें लिया जाए’, ऐसा संगठनके अनेक पदाधिकारी विचार करते हैं । ‘सनातन’के कार्यकर्ताओंका ईश्वर चरणोंमें स्थान है; अतः उन्हें सनातनको त्यागकर अन्य संगठनमें जानेकी इच्छा ही नहीं होती ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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नौकरीमें थोडासा वेतन पानेके लिए ७-८ घण्टे चाकरी (नौकरी) करनी पडती है, तो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी तथा सर्व सामर्थ्यवान ईश्वर प्राप्तिके लिए सम्पूर्ण आयुष्य (जीवन) नहीं देना चाहिए क्या ? – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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पूर्व कालमें राजाको प्रजा पुत्रवत लगती थी । लोकतन्त्रमें शासनकर्ता प्रजाको लूटने लिए हैं, ऐसा लगता है ।  

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श्रीराम स्वयं ईश्वर अवतार थे । पाण्डवोंके कालमें पूर्णावतार श्रीकृष्ण थे । छत्रपति शिवाजी महाराजके कालमें समर्थ रामदासस्वामी थे । इससे ज्ञात होता है कि ईश्वरीय राज्यकी स्थापना ईश्वर स्वयं करते हैं अथवा सन्तोंसे करवा लेते हैं । अब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना ईश्वर स्वयं करें अथवा सन्तोंसे करवाकर लें, इस हेतु हमें उनका भक्त बनना […]

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कोई व्यक्ति चिकित्सक (डॉक्टर) न हो तो रोगीपर उपाय नहीं करने दिया जाता; किन्तु जिनमें भक्तिभाव न हो उन्हें मन्दिरमें पुजारी, व्यवस्थापक नियुक्त किया जाता है ! हिन्दुराष्ट्रमें इस पापका फल उत्तरदायी शासकीय व्यक्तियोंको भोगना ही पडेगा ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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सभी जीवोंमें एक भी जीव किसी दूसरे जीव जैसा नहीं होता, उदा. वृक्ष, कुत्ते, उसीप्रकार पृथ्वीके ७५० कोटि मानवोंमें एक भी किसी दूसरे जैसा दिखाई नहीं देता । इतना ही नहीं, उनके वैशिष्ट्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं, ऐसा होनेपर भी ‘साम्यवाद’ शब्दका प्रयोग करनेवालोंकी बुद्धि कितनी शूद्र है, यह ज्ञात होता है । – परात्पर […]

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प्रवचनकार तथा कीर्तनकार समाजको धर्मका थोडा बहुत ज्ञान देते हैं । उनके अतिरिक्त ऐसा करनेवाला, समाजमें कोई नहीं ।

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तन, मन तथा धनके त्यागोंमें, धनका त्याग करना सबसे अल्प कष्टदायी !


इसका कारण यह है कि इसमें, स्वयंके रुपये अथवा कागदपर (कागज) हस्ताक्षर कर, वे कागद (कागज) देने होते हैं । इसके लिए विशेष श्रम नहीं करना पडता । इसके विपरीत तनका त्याग करनेके लिए कई वर्षोंतक सेवा करनी पडती है तथा मनका त्याग करनेके लिए नामजप तथा स्वभावदोष निर्मूलन हेतु स्वयंसूचना देनेका कार्य भी कई […]

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धर्मके कारण मुसलमान, ईसाई तथा बौद्ध एक होते हैं, इसके विपरीत हिन्दू धर्मका अभ्यास न किए हुए जात्यन्ध तथा बुद्धिप्रामाण्यवादी, हिन्दुओंमें जातिवादसे आपसमें फूट डालते हैं; इसलिए हिन्दुओंका जगमें तो क्या भारतमें भी कोई मूल्य नहीं !  

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जिन साधकोंका नामजप अच्छेसे होता है, उन्हें प्रार्थना करनेकी आवश्यकता नहीं । प्रार्थनामें अनेक शब्द होते हैं और नामजपमें अल्पशब्द होते हैं; इसीलिए प्रार्थनाके स्थानपर नामजपसे अनेकसे एकमें प्रवास होता है । वैसे प्रार्थना भी एक प्रकारकी स्वेच्छा है । उसे भी नष्ट करना है । साधनामें स्वेच्छासे परेच्छाकी ओर एवं आगे ईश्वरेच्छाकी ओर जाना […]

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