श्रीगुरु उवाच

श्रीगुरु उवाच


अध्यात्ममें आयुका नहीं; अपितु आध्यात्मिक स्तरका महत्त्व होता है !

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श्रीगुरु उवाच


जनता राष्ट्रभक्त, निस्वार्थी और धैर्यपूर्वक विचार करनेवाली होगी, तो ही लोकतन्त्र यशस्वी होगा !

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श्रीगुरु उवाच


पाश्चात्योंसे सीखी ‘उपयोग करो और फेंक दो ‘ (यूज एण्ड थ्रो) इस नीतिसे हिन्दू भी चाकरी (नौकरी) मिलनेतक माता-पितासे लाभ लेकर चाकरी पानेपर उनका त्याग कर देते हैं, अर्थात उन्हें पूर्ण रूपेण दुर्लक्ष करते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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श्रीगुरु उवाच


हिन्दू और पाश्चात्य संस्कृतिमें भेद पाश्चात्य संस्कृति स्वेच्छाको प्रोत्साहन देनेवाले व्यक्तिस्वातन्त्र्यको पुरस्कृत करती है तथा दुःखको निमन्त्रण देती है तो हिन्दू संस्कृति स्वेच्छा नष्टकर सत्/सत-चित्/चित-आनन्दावस्था कैसे प्राप्त की जाए ?, यह सिखाती है । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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श्रीगुरु उवाच


पाषाणपर (पत्थरपर) बीज नहीं उगता, उसी प्रकार स्वभावदोष तथा अहंपर साधनाका बीज नहीं उगता; इसीलिए स्वभावदोष तथा अहम् निर्मूलनको गुरुकृपायोगमें प्राधान्य दिया गया है ।

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चुटकी भर ज्ञानका अहंकार न करें !


विश्वके अनन्त विषयोंमेंसे एक विषयका थोडासा ज्ञान होनेपर आधुनिक वैद्य (डॉक्टर), अधिवक्ता (वकील), स्थापत्यविशारद (इंजीनियर), लेखपाल (अकाउण्टेण्ट), कलाकार इत्यादिमेंसे कुछ बन जानेका अहंकार करनेवाला मनुष्य कितना मूर्ख होता है; कारण ईश्वरको केवल पृथ्वीकी मायाके सर्व विषयोंका ही नहीं; अपितु मायासह अनन्त कोटि ब्रह्माण्डका तथा ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान होता है ।

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श्रीगुरु उवाच


स्वार्थ तथा भोगवादका बोलबाला होनेपर तथा मानवता शब्दका अस्तित्व नष्ट होनेकी स्थिति आनेपर विद्यार्थी वनसे साधना करवा लेना ही इसपर एकमात्र उपाय है, इससे भी अज्ञात, स्वातंत्र्योत्तर कालके विविध राज्यकर्ता देनेवाला लोकतन्त्र अब और नहीं । इसके स्थानपर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करें ! – १. डॉक्टर, अधिवक्ता (वकील), अभियन्ता, व्यापारी, पुलिस, शासकीय कर्मचारी, लोकप्रतिनिधि, मन्त्री […]

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धर्मद्रोहियोंका सातत्यसे, वैध मार्गसे विरोध करें !


धर्मद्रोहियोंका सातत्यसे, वैध मार्गसे विरोध करें ! धर्मकी निन्दा करनेवालोंका मुख वैध मार्गसे बन्द करना आवश्यक होता है । वैसा करना अर्थात उन्हें जडसे उखाडना । वैसा न करके, उनकेद्वारा की गई निन्दा अनुचित है, ऐसा सर्वत्र कहते फिरना अर्थात एक-एक पर्ण (पत्ता) तोडनेका प्रयास करना है । एक पर्ण तोडना अर्थात समाजके किसी एकके […]

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मनोविकार पूर्णरूपेण ठीक करना हो तो, प्रथम साधनासे मन एवं बुद्धि सात्त्विक करें अथवा मनोलय तथा बुद्धिलय करें !


मनोविकारोंपर जो चिकित्सा की जाती है, वह रोगके मूल कारणको दूर न कर, मात्र ऊपर-ऊपर उपाय करने जैसे होता है (इसीलिए मैंने मनोरोगियोंपर चिकित्सकीय उपाय न कर उनसे साधना आरम्भ करवाई) । मनोविकारोंके लिए कारणीभूत रज-तम प्रधान मन एवं बुद्धिको साधनासे सात्त्विक न करना अथवा मनोलय एवं बुद्धिलय न करना अर्थात मूलपर उपाय न कर […]

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श्रीगुरु उवाच


धर्मके आधारपर ईसाई तथा मुसलमान जगभरमें वर्चस्व दर्शाते हैं । हिन्दुओंने धर्म त्याग दिया है; अतः उनकी स्थिति सम्पूर्ण जगतमें ही नहीं; अपितु भारतमें भी दयनीय हो गई है ।

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