श्रीगुरु उवाच

साधकों ! चारों वर्णानुसार साधना नहीं कर पा रहे हैं; ऐसेमें व्यथित न हों !


धर्मरक्षणके वर्णानुसार अग्रिम चार प्रकार हैं । कुछ साधक सोचते हैं कि चारों वर्णानुसार साधनाकर शीघ्र प्रगति करें ! वे यह समझ लें कि केवल ईश्वर ही चारों वर्णानुसार साधनाके उदाहरण हमारे समक्ष रख सकते हैं ! हमारे पास बुद्धि, धन, शारीरिक क्षमता, इनमेंसे जो भी हो उसे अर्पण करना साधनामें अपेक्षित होता है; इसलिए […]

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रसोईघरमें सेवा करनेसे शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति होनेके कारण


रामनाथी आश्रमके अन्नपूर्ण कक्षमें (रसोईघरमें) सेवा करनेवाले साधकोंकी दैनिक सनातन प्रभात, ग्रन्थ विभाग, कला विभाग, लेखा विभाग इत्यादि विभागोंमें सेवा करनेवाले साधकोंकी अपेक्षा शीघ्र प्रगति होती है । इसके कारण निम्नलिखित हैं :- १. अन्य विभागोंके साधकोंका सम्बन्ध केवल संगणकसे होता है । उन्हें अन्य लोगोंसे बोलनेका, उनसे निकटता साधनेका समय नहीं मिलता । इसके […]

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बच्चोंको दाएं हाथसे लिखना सिखाएं !


पालको, बाएं हाथसे लिखनेवाले बालकोंको दाहिने हाथसे लिखनेकी प्रवृत्ति निर्माण हो, इसहेतु उनपर क्रोध करनेकी अपेक्षा, उन्हें स्वयंसूचना देनेको कहो ! बाएं हाथसे नहीं, दाहिने हाथसे लिखना चाहिए । बच्चे बचपनमें नूतन कार्य तुरन्त आत्मसात कर लेते हैं । बडे होनेपर आत्मसात करना कठिन होता है । जब ये बालक बडे होकर समाजमें जाएंगे, तब […]

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श्रीगुरू उवाच


धर्मद्रोहियोंके विचारोंका खण्डन करना, यह समष्टि साधना है !    इसकारण धर्मद्रोहियोंके विचार अयोग्य हैं, यह कुछ व्यक्तियोंके भी संज्ञानमें आए तो वे योग्य मार्गसे गमन करते हैं ।

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श्रीगुरू उवाच


भारतीय जनता लोकतन्त्रके उपयुक्त है क्या ? १. राष्ट्र तथा धर्मसे जिन्हें कोई लेना -देना नहीं, ऐसे व्यक्ति ५००-१००० रुपयोंके लोभमें देशको पतनकी ओर ले जानेवालोंका वर्षोंसे चुनाव करते आ रहे हैं, यह है, भारतीय लोकतन्त्रका प्रमुख लक्षण ! २. आधुनिक वैद्य (डॉक्टर), अधिवक्ता, अभियन्ता, प्राध्यापक इत्यादिके सङ्गठनोंके चुनावमें जनताका मताधिकार नहीं होता; परन्तु जनता […]

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श्रीगुरु उवाच


साधनाके लिए अनुपयुक्त प्रश्न पूछकर स्वयंका तथा अन्योंका समय व्यर्थ न करें !   जब ईश्वरप्राप्ति हेतु मन तथा बुद्धि नष्ट करना है तो मन तथा बुद्धिसे पूछे गए अनेक प्रश्नोंके उत्तर ढूंढनेमें समय क्यों व्यर्थ करें ? वही समय साधनामें देनेसे शीघ्र प्रगति होती है ।

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श्रीगुरु उवाच


हिन्दुओ, सन्तोंसे पूछकर ही राष्ट्र एवं धर्मकार्य करें ! हम वैयक्तिक जीवनमें विविध प्रसङ्गोंमें योग्य निर्णय लेने हेतु अपने सगे-सम्बन्धी, मित्र, वैद्य, अधिवक्ता, लेखापरीक्षक इत्यादिसे सुझाव लेते हैं । उसीप्रकार राष्ट्र एवं धर्मसे सम्बन्धित निर्णय, राष्ट्र तथा धर्मप्रेमी सन्तोंसे पूछकर ही लेने चाहिए ।

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हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना केवल सन्तोंके संकल्प एवं अस्तित्वके कारण होनेवाली है !


हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु कार्यरत हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ता और नेतागणद्वारा तथा सन्तोंद्वारा किए जानेवाले कार्योंमें आकाश-पातालका अन्तर है, जो निम्नलिखित है । (सन्तोंमें भी भिन्न प्रकार हैं, यहां उल्लेखित सन्त उच्च कोटिके हैं ।) १. कार्यकर्ता : ये मन एवं स्थूल देहके स्तरपर कार्य करते हैं । २. नेता : ये बुद्धिके स्तरपर कार्य करते हैं […]

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सन्तों एवं राजकीय पक्षोंमें अन्तर


राजकीय पक्षोंको चुनावके समय प्रचार करना पडता है; क्योंकि उनकेद्वारा कोई कार्य घटित नहीं होता । इसके विपरीत सन्तोंके पास बिना प्रचारके सदैव ही सहस्रों (हजारों) व्यक्ति आते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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हिन्दुओ, सन्तोंके पास जानेपर आभार नहीं, कृतज्ञता व्यक्त करें !


कुछ हिन्दू, सन्तोंके पास जाकर अथवा सन्तोंसे मार्गदर्शन लेनेपर आभार (थैंक्स) व्यक्त करते हैं । किसी व्यावहारिक कार्यके पूर्ण होनेपर उसमें सहायता करनेवालेके प्रति औपचारिकतावश आभार व्यक्त किया जाता है । इसके विपरीत जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्त होने हेतु सन्तोंद्वारा साधना विषयक किया जानेवाला मार्गदर्शन, यह हमपर किए जानेवाले उपकार होते हैं । इन उपकारोंकी भरपाई […]

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