भारतीय लोकतन्त्रमें बुद्धिहीनताकी परिसीमा कोई बात किस प्रकार की जाए ? किसी सन्दर्भमें क्या निर्णय लिया जाए ? यह उस विषयके विशेषज्ञ सोचते तथा करते हैं; किन्तु भारतपर शासन कौन करेगा ? इसका निर्णय उस विषयका कोई ज्ञान न रखनेवाली जनता लेती है !
१. हिन्दू राष्ट्र स्थापनाके सन्दर्भमें साधनाका महत्त्व ध्यानमें रखें ! सातवें ‘अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन’में भारतभूमिके सुपुत्र एकत्र हो रहे हैं । यह सभीके लिए आनन्ददायी घटना है । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाका कार्य करने हेतु शारीरिक एवं वैचारिक क्षमताके साथ-साथ आध्यात्मिक बल होना भी आवश्यक है । स्वयंमें आध्यात्मिक बलकी वृद्धि केवल साधना करनेसे ही […]
अध्यात्म अन्तिम सत्य बताता है, यह सिद्ध करने हेतु अर्थात बुद्धिप्रामाण्यवादियोंका मुख बन्द करनेके लिए वैज्ञानिक उपकरणोंका उपयोग होता है । इतना ही है विज्ञानका महत्त्व !
विज्ञानके शोधके परिणामस्वरूप सर्व देश एक-दूसरेका विध्वंस प्रभावी रूपसे कर सकते हैं । इसके विपरीत साधना सिखानेके कारण सर्व देशोंकी अगली पीढियोंके नागरिकोंमें एक कुटुम्बभावना निर्माण होगी । इसलिए तीसरे महायुद्धके उपरान्त पृथ्वीपर सर्वत्र कुटुम्बभावना होगी ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
भगवानका दासत्व मन्त्री, राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री इत्यादि पदोंकी तुलनामें श्रेष्ठ है !
आजके राजनीतिज्ञोंका एकमेव उद्देश्य है स्वार्थसिद्धि, जबकि क्रान्तिकारियों तथा साधकोंका एकमेव उद्देश्य है राष्ट्र तथा धर्मकी हित साधना !
साधना करनेसे कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है । यह अभी तकके युगोंमें लाखो साधकोंने अनुभव किया है; परंतु साधनापर विश्वास न रखनेवाले अंनिस (अन्ध श्रद्धा निर्मूलनवाले) और बुद्धिप्रमाणवादियोंकी कुछ भी साधना न होते हुए भी बोलते है, “कुंडलिनी दिखाओ, नहीं तो वह नहीं है !” – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
अंधा कहता है, दृश्य जगत नामक ऐसा कुछ नहीं है । उसी प्रकार अंधश्रद्धा निर्मूलन समितिवाले और बुद्धिप्रमाणवादी कहते हैं कि सूक्ष्म जगत, भूत इत्यादि कुछ नहीं; इसलिए उन्हें सूक्ष्म विषय समझनेकी जिज्ञासा ही नहीं होती और उनमें सूक्ष्म जगत अनुभव करनेके लिए जो साधना करनी होती है, उसे करनेकी उनकी क्षमता भी नहीं होती […]
प्रत्येक पीढीका कर्तव्य ! : प्रत्येक पीढी अपनी अगली पीढीकी ओर समाज, राष्ट्र और धर्मके विषयमें आशाभरी दृष्टिसे देखती है । परंतु, उचित यह होगा कि प्रत्येक पीढी यह सोचे कि हम क्या कर सकते हैं ?, यह विचारकर ऐसा कार्य करना चाहिए कि आगामी पीढीको इस विषयमें कुछ करनेकी आवश्यकता ही न रहे । […]
जिसने सर्वधर्मसमभाव शब्दकी खोजकी और इसे माननेवालोंपर दया आती है; इसलिए कि उन्हें धर्म क्या है, इसका रत्तीभर भी ज्ञान न होते हुए भी इस शब्दको प्रचलित किया….