बुद्धिप्रामाण्यवादियोंको ऐसा अहंकार होता है कि उन्हें सब ज्ञात है; इसलिए उन्हें कुछ भी जाननेकी जिज्ञासा न होनेसे बुद्धि-अगम्य अध्यात्मशास्त्रका, उन्हें मूलत: ज्ञान नहीं होता, तथापि वे अध्यात्मके अधिकारी, सन्तोंपर टिप्पणी (टीका या आलोचना) करते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
कृष्णको तुलसी प्रिय है, ऐसे वाक्य भक्तियोगमें होते हैं । कुछ व्यक्तियोंको लगता है, भगवानको प्रिय-अप्रिय कैसा ? प्रत्यक्षमें ऐसे वाक्यका अर्थ होता है, तुलसीमें श्रीकृष्णतत्त्व अधिक प्रमाणमें होता है – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले
साधकोंने निम्न प्रार्थना प्रतिदिन प्रातःकाल एवं देवालय(मंदिर) तथा मठमें जानेपर तथा संतोके दर्शन हेतु जानेपर एकबार करनी चाहिये तथा अन्य समय भी करनी चाहिए – १. हे ईश्वर, मुझपर हुए अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणका परिणाम समूल नष्ट होने दें । मेरे देहके सर्व रोगोंका नाश करके मुझे उत्तम आरोग्य लाभ दें । ( किसीको अनिष्ट शक्तिका […]
विद्यालयोंमें गणित, भूगोल, अर्थशास्त्र आदि अनेक विषय पढाए जाते हैं । क्या इनमेंसे किसी भी विषयका हमारे जीवनमें १ प्रतिशत भी लाभ होता है ? यदि ऐसा है, तब विद्यार्थियोंको इन विषयोंके स्थानपर समाजप्रेम, राष्ट्रप्रेम, धर्मप्रेम, अध्यात्मशास्त्र, साधना जैसे विषय क्यों नहीं पढाए जाते ? हिन्दू राष्ट्रमें ये सब विषय पढाए जाएंगे ।- परात्पर गुरु […]
साधना करना नहीं जमता इसलिये मैं पुनः व्यवहारमें जाता हूं, ऐसा विचार करनेकी अपेक्षा, मुझे आज नहीं तो कल साधना करनी सम्भव होगी, ऐसा सकारात्मक विचार करनेसे कभी न कभी तो प्रगति होगी; मात्र व्यवहारमें जानेसे जन्मजन्मान्तर व्यर्थ होंगे । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले
गोवाके मराठी भाषाप्रेमियो, केवल मराठी भाषा हेतु न लडते हुए हिन्दुराष्ट्र लाने हेतु प्रयत्न करो ! हिन्दुराष्ट्र स्थापित होनेपर मराठी भाषासह गोवंशरक्षा, राममन्दिर निर्माण, गंगाप्रदूषण रोकना इत्यादि सर्व समस्याओंका समाधान होगा – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले
केवल हिन्दू सन्त ही सर्वधर्मसमभाव इस शब्दका उपयोग करते हैं । अन्य किसी भी धर्म या पन्थमें इस शब्दका उपयोग नहीं किया जाता । प्रत्येक जन हमारा ही धर्म अथवा पन्थ श्रेष्ठ है, ऐसा कहता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका इत्यादि देश ही नहीं, भारतके कश्मीरसह सभी हिन्दू आधारहीन हो गये हैं । यह आधार देने हेतु हिन्दुराष्ट्रकी स्थापना करना अपरिहार्य हो गया है । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले
जनताका शिक्षण, आरोग्य, रुचि-अरुचि इनमें भी साम्यवादी, साम्यवाद(समानता) नहीं ला सकते, ऐसेमें वे राष्ट्रमें साम्यवाद क्या लायेंगे ? – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले
साधकोंके प्रति प्रीति होनी चाहिए तथा अप्रिय घटनाओंकी ओर साक्षीभावसे देखना आना चाहिए । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले