जिन साधकोंकी साधना ईश्वरप्राप्ति हेतु होती है, उन्हें किसी संस्थाकी, संगठनकी या पक्षके किसी पदकी, उसी प्रकार लोकप्रतिनिधिपद, मंत्रीपद या प्रधानमंत्री पद इसकी आसक्ति होगी क्या ? –परात्परगुरु डॉ. जयंत आठवले (२६.१२.२०१४)
‘साधनानां अनेकता व उपास्यानाम् अनियम्: ।’ अर्थात प्रत्येक व्यक्तिकी क्षमता भिन्न होती है, अतः अन्य धर्म समान, सनातन धर्ममें एक ही मार्ग और एक ही आराध्यकी उपासना नहीं होती | –परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले भावार्थ: प्रत्येक व्यक्तिका संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म, पंच-तत्त्व, पंच महाभूत, स्वभाव, आध्यात्मिक स्तर, इत्यादि सब कुछ भिन्न होता है, अतः […]
हिन्दुओं ! परिवर्तन लानेके लिए पुलिसके डंडोंसे न डरते हुए पुलिसके अत्याचारोंके विरुद्ध उनके वरिष्ठोंसे परिवाद (शिकायत) करें ! एक घटनामें पुलिसने एक हिन्दू एवं उसके कुटुंबियोंपर अत्याचार किए । इस घटनापर पुलिसमें प्राथमिकी प्रविष्ट करानेपर भी (FIR) पुलिसने अत्याचारी पुलिसवालोंके विरुद्ध कार्यवाही नहीं की । पुलिसके इस अनैतिक वर्तनके विरोधमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियोंके पास […]
‘बुद्धिप्रामाण्यवादियोंके बहकावेमें आकर बुद्धिके परे जो धर्म है, उसे छोडनेसे ही जगतके अन्य सभी धर्मियोंकी अपेक्षा हिन्दुओंकी अधिक दयनीय स्थिति हुई है ।-परात्पर गुरु परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले (२७.१२.२०१४) (मुसलमान और ईसाई अपने धर्मगुरुओंके आदेशको अंतिम आदेश मानकर उनका पालन करते हैं वहीं मैकालेकी शिक्षण पद्धतिमें शिक्षित अधिकांश हिन्दू नास्तिक और निधर्मी बुद्धिवादके प्रपंचमें सरलतासे […]
पंचमहाभूतोंमेंसे तेजतत्त्व एवं आकाशतत्त्व सीखनेके आधारभूत होते हैं । तेजतत्त्वके कारण नेत्रोंके माध्यमसे तथा आकाशतत्त्वके कारण कानके माध्यमसे हम सीख सकते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले (१३.११.२०१४) (पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश, इन पञ्चतत्त्वोंको महाभूत कहा जाता है, सृष्टिकी निर्मिति इन तत्त्वोंके बिना असंभव है – तनुजा ठाकुर
अकेले नरेन्द्र मोदी आदर्श राष्ट्ररचना हेतू क्या कर सकेंगे ? आज देशके नागरिक सोचते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आदर्श राष्ट्ररचना हेतु प्रयत्न करेंगे। आदर्श राष्ट्ररचनाको संस्कृतमें धर्मसंस्थापना कहते हैं । यह व्यापक राष्ट्रकार्य कोई अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता । इसके लिये प्रामाणिक, निःस्वार्थी, भ्रष्टाचार न करनेवाले (सदाचारी), सज्जन, नीतीमान, चारित्र्यसंपन्न, राष्ट्रभक्ति, धर्माभिमानी […]
यह सूत्र निम्न विवेचनसे ज्ञात होगा – किसी भी कार्यके कार्यान्वित होनेके पांच स्तर होते हें । विषय समझने हेतु हम भक्तिमार्गका उदाहरण लेंगे । प्रथम स्तर – इच्छित हाकार्य पूर्ण होने हेतु पूजा-पाठ, अनुष्ठान, तीर्थक्षेत्र जाना इत्यादि रूपी साधना करना । द्वितीय स्तर – प्रत्यक्ष पूजा पाठ न करते हुए मानस पूजा करना । तृतीय […]
त्यागके कारण व्यष्टि साधना होती है समष्टि साधना नहीं होती | कुछ व्यक्तिको लगता है कि तन, मन और धन त्याग किया है अतः हमारी आध्यात्मिक प्रगति तो निश्चित ही होगी | उन्हें यह ध्यानमें रखना चाहिए कि मात्र तन, मन और धनका त्याग पर्याप्त नहीं होता अपितु प्रीति ( निरपेक्ष प्रीति ) जैसा गुण […]
हिंदुओ ! सम्पूर्ण जीवन धर्म कार्य करनेका दृढ संकल्प लें ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
पाकिस्तान, बांग्लादेश इत्यादि इस्लामी देशोंकी चतुराई ! पाकिस्तान और बांग्लादेशने अपने देशके हिन्दुओंको समाप्त कर दिया और अब कहते हैं हमारे देशमें जातीय दंगे नहीं होते, वे तो भारतमें होते हैं !