धर्मधारा


आजके राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं या सदस्योंमें अपने दलके प्रति ही निष्ठा नहीं सिखा पाते हैं। निर्वाचित सदस्य किसी और दलमें सत्ता पानेके लोभमें बिक न जाएं इसलिए अब उन्हें वे ‘रिसोर्ट’में सर्व सुख सुविधाएं देकर एक प्रकारसे कुछ दिवसके लिए बन्दी बनाकर रख लेते हैं जिसे कोई और दल उन्हें धन देकर अपनी ओर न मिला ले ! ऐसे राजनेता जो अपने दलके प्रति निष्ठावान नहीं हो सकते हैं, वे समाज और राष्ट्रके प्रति निष्ठावान हो सकते हैं क्या ? किंचित सोचें !



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