
संतोंका अहं नष्ट हो गया होता है, वे मान अभिमान से परे जा चुके होते हैं , उन्हें विषय वस्तुओंका आकर्षण नहीं होता अतः किसी वस्तुके खोनेका भी डर नहीं होता | संत ईश्वरसे एकरूप हो चुके होते हैं , ईश्वरकी अनंत शक्ति उनमें समाहित होती है अतः वे निडर होते हैं – तनुजा ठाकुर
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