अध्यात्म एवं साधना

सापेक्ष – निरपेक्ष


सुख और दुख वस्तु, काल और परिस्थिति सापेक्ष है एवं आनंद वस्तु, काल और परिस्थिति निरपेक्ष है  -तनुजा ठाकुर

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हमारे पिंडमें किस तत्त्वकी कमी है उसे बतानेवालेको ही सद्गुरु कहते हैं |


हमारे सूक्ष्म पिंडमें जिस तत्त्वकी कमी होती है उस तत्त्वकी अर्थात उस देवताके नामजप करनेसे हमारी आध्यात्मिक प्रगति द्रुतगतिसे होती है । हमारे पिंडमें किस तत्त्वकी कमी है उसे बतानेवालेको ही सद्गुरु कहते हैं  -तनुजा ठाकुर

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नामजप एवं उसके प्रकार


यदि हमें नामजपके अगले-अगले चरणका न पता हो, तो भी हम वैखरी (उच्चारण करते हुए) या मध्यमा (मानसिक जप) वाणीके जप तक ही आकर स्थिर हो जाते हैं ।नामजपका अगला स्तर है पश्यंती वाणीका नामजप । इस प्रकार हमें नामजपके अगले स्तरमें जानेका प्रयास करना चाहिए । इस हेतु नामजपको सांसके साथ जोड़ना, नामजपमें संख्यात्मकके […]

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भगवान शिव


शिव एको गुरु:साक्षात् गुरुरेव शिव स्वयं | उभयोरन्तरं किंचित् न द्रष्टव्यं मुमुक्षुभि || अर्थ : भगवान शिव खरे गुरु हैं और गुरु ही स्वयं भगवान शिव हैं । मुमुक्षु ने दोनों में तनिक भी भेद नहीं करना चाहिए !  

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नामजप वृद्धिके कुछ सरल उपाय


प्रतिदिन रात्रिमें सोनेसे पूर्व (जब पलकें नींदसे बोझिल होने लगें ) एक स्वयंसूचना १० से १५ बार अपने अंतर्मनको दें : “जब-जब मेरे मनमें अनावश्यक विचार आएंगे, मैं सतर्क हो जाऊंगी/जाऊंगा और नामजप करूंगा या करूंगी”। ऐसा करनेसे दिनभर मनमें दिनमें जब भी अनावश्यक विचार आएंगे मन सतर्क होकर नामजप करने लगेगा और धीरे-धीरे अनावश्यक […]

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ईश्वर के दो रूप होते है एक मारक एवं दूसरा तारक


ईश्वरका मारक रूप भी, ईश्वरका एक भक्तवत्सल स्वरूप ही है। उनके जो उद्दंड बच्चे धर्म, नीति और न्यायका पालन नहीं करते, सज्जनों एवं भक्तोंको अपने कृकृत्योंसे कष्ट देते हैं और जब ऐसे दुर्जनोंके कुकर्मोंसे सर्वत्र हाहाकार मच जाता है तब ईश्वर उन्हें उसी प्रकार दंड देते हैं जैसे एक सगी मां अपने बच्चेको कुमार्गपर जाते […]

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इस जन्म नहीं तो अगले जन्म, हमारा क्रम भी आएगा ही आएगा !


एक साधकने मुझसे पूछा कि मेरा अध्यात्मिक स्तर तो मात्र चालीस प्रतिशत है मुझे संत बनने (अर्थात ७० % स्तर साध्य करनेमें) में या ईश्वर प्राप्ति करने में तो अनेक जन्म लग जायेंगे ! मैंने कहा , “जैसे हमें रेलयानकी यात्रा-पत्रक (टिकिट) लेनी हो और पंक्ति अत्यधिक लम्बी हो तो भी हम वहां जाकर खडे […]

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आध्यात्मिक प्रगति द्रुत गतिसे हो इस हेतु हमारा व्यक्तिनिष्ठ नहीं अपितु तत्त्वनिष्ट होना आवश्यक है


आध्यात्मिक प्रगति द्रुत गतिसे हो इस हेतु हमारा व्यक्तिनिष्ठ नहीं अपितु तत्त्वनिष्ट होना आवश्यक है । वर्ष २००० में एक जिज्ञासु प्रवृत्तिके दंपती साधना करने लगे । वे संभ्रांत वर्गसे हैं, अतः उनका घर भी बडा है । मैंने उन्हें तत्त्वनिष्ठ  होनेके लिए अनेक बार बताया परंतु वे सदैव व्यक्तिनिष्ठ रहे परिणाम यह है कि […]

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मैं अपने श्री गुरुकी ध्वनिप्रक्षेपक यंत्र मात्र हूं कोई विदुषी नहीं !


मेरे कुछ पाठक मेरेद्वारा दिये शंकाओंके समाधानपर मेरी विद्वताकी भूरी-भूरी प्रसंशा करते हैं , इन सभी प्रसंशको मैं सूचित करना चाहुंगी कि मैं कोई विदुषी नहीं मात्र अपने श्रीगुरुद्वारा लिखे सभी तत्त्वों का सूक्ष्मतासे अभ्यास किया है और उसे आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती हूं । मेरेद्वारा दिये गए राष्ट्र एवं धर्म विषयक […]

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ईश्वरकी कृपा बहिर्मुख व्यक्तिको नहीं अंतर्मुख प्रवृत्तिके साधकको प्राप्त होती है


हमसे कोई चूक हो और हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते और उसके लिए या तो दूसरे को दोषी टहराते हैं या मैं कैसे दोषी नहीं हूं इसके पक्षमें अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं तो समझें कि हमारी प्रवृत्ति बहिर्मुख है ! हमसे कोई चूक हो और हम विनम्रतासे उसे स्वीकार कर उस चूक मार्जन […]

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