एक बार हमारे श्रीगुरुने कहा, “जब तक कोई हमारा अपना नहीं होता है, तो हम उससे मीठा-मीठा बोलते हैं, जब वह हमारा हो जाता है तो हम उसे उसकी चूकें और अहंके लक्षण, सबके समक्ष बताने लगते हैं; जिससे उस जीवात्मामें दोष और अहं नष्ट हो जाए और वह आत्मा प्रकाशी हो पूरे विश्वको ज्योति […]
साठ प्रतिशतसे अधिक आध्यात्मिक स्तरके व्यक्तिका यदि तीव्र प्रारब्ध न हो तो या तो उनका विवाह नहीं होता या विवाहके कुछ समय उपरांत वे सन्यस्त-जीवन समान जीवन व्यतीत करते हैं । ऐसे साधक विवाहके इच्छुक नहीं होते या वे उच्च कोटिके संतके मार्गदर्शनमें साधना करते हुए सन्यासी समान जीवन व्यतीत करते हैं अथवा यदि गृहस्थ […]
ईश्वर प्राप्ति हेतु जो ज्ञान और भक्ति का सटीक सदुपयोग करते हैं उन्हें मुक्तिकी अनुभूति अतिशीघ्र प्राप्त होती है । मैंने कई साधकोंको सगुण भक्तिमें अटकते देखा है क्योंकि निर्गुणके प्रवास हेतु वे ज्ञानका सदुपयोग नहीं करते और कई बुद्धिजीवी साधकोंको शब्दोंके भ्रमजालमें और बौद्धिक समीक्षामें उलझते देखा है ! इन दोनोंके संयोग वैसे तो […]
कुछ भक्त एक ही शंका या समस्या का समाधान दो तीन संतों से पूछते हैं और उसके पश्चात भ्रमित हो जाते हैं क्योंकि संतों ने जिस योगमार्ग अनुसार साधना की होती है वे उसी अनुसार उनका मार्गदर्शन करते हैं !! ध्यान रहे एक खरे संत आपको मोक्ष दिलाने की क्षमता रखते हैं अतः प्यास लगी […]
सत्संग शब्दकी व्युत्पत्ति सत जोड संगसे हुई है यहां सतका अर्थ है ईश्वर या ब्रह्म तत्त्व अर्थात् जो शाश्वत है, जो सनातन है, नित्य है, जो कभी नहीं बदलता उसे सत कहते है और संगका अर्थ है संगत अर्थात् ईश्वर या ब्रह्मतत्त्वकी अनुभूति हेतु अर्थााात अध्यात्मकी दृष्टिसे पोषक वातावरण । कीर्तन या प्रवचनके लिए जाना […]
१. हमारा यह मनुष्य जीवन इच्छाओंकी तृप्ति हेतु नहीं, अपितु साधनाकर इच्छाओंपर विजय पाने हेतु है, यह मनको बार–बार सूचित करें ! २. ‘सन्तोषम् परम सुखं’ इस सिद्धान्त अनुसार ईश्वरने जितना दिया वह पर्याप्त है, यह सोच जीवन यापन करें ! ३. जब-जब नई-नई इच्छाओंका जन्म हो और उनकी पूर्ति हेतु मनमें विचार आएं, अपनेसे […]
आनंद, सुख और दुखसे परेकी स्थिति होती है ! जब तक साधकका मन बाह्य सुखकी ओर भागता है और दुखसे व्यथित हो जाता है, उसे समझना चाहिए कि उसने आनंदकी अनुभूति नहीं चखी है अर्थात खरे अर्थोंमें साधना आरंभ नहीं हुई है क्योंकि जिसे आनंदकी अनुभूति हो चुकी होती है उसका मन सांसरिक विषयोंकी ओर […]
साधक किसे कहते हैं ? कुछ दिन पहले एक व्यक्तिसे मिली वे मेरे पोस्टको साझा करते हैं मात्र उसे न ही पढते हैं और न ही जीवन में उतारते हैं ! अध्यात्म कृति का शास्त्र है यह ध्यान में रख, उसे जीवन में अमल में लाने वाले को साधक कहते हैं ! दिखावटी भक्ति से […]
परमेश्वर के सगुण और निर्गुण स्वरूपमें कोई भेद नहीं परंतु एकांगी साधना करनेवाले तथाकथित इस तथ्यको स्वीकार नहीं करते ! -तनुजा ठाकुर
अपने पन्द्रह वर्षोंके साधनाके कालखण्डमें आकस्मिक रूपसे कुछ तन्त्र मार्ग अनुसार साधना करनेवाले, साधक प्रवृत्तिके, तान्त्रिकोंसे मेरी भेंट हुई । मेरी जिज्ञासु प्रवृत्तिने मुझे उनकी साधनाके स्थूल और सूक्ष्म पहलूके विषयमें कुछ तथ्य एकत्रित करवाए, जिससे मुझे समझमें आया कि अधिकांश तान्त्रिकोंने शक्तिको भार्या स्वरूपमें मानकर साधना की और वे सब एक स्तरके पश्चात उसकी […]