ख्रिस्ताब्द २००० में मैं अयोध्या में धर्म प्रसार की सेवा कर रही थी । एक दिन संध्या के समय मैं सरयू नदी के तट टहलने गयी । सरयू नदी के पास घाट पर पहुंची तो एक संत को दूर से हमारी दिशा में आते दिखे, पता नहीं कैसे मैंने उन्हे दूर से ही सूक्ष्म अभिवादन […]
अनेक साधक कहते हैं कि ध्यान करता हूंं, परन्तु साठ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरके नीचे ध्यान नहीं होता, अपितु ध्यानाभ्यास होता है; क्योंकि ध्यान करनेके लिए मनमें विषय-वासनाके संस्कार न्यून होने चाहिए ! अतः सन्तोंने कलियुगकी योग्य साधना नामजप बताई है; क्योंकि आज विश्वकी ८०% जनसंख्या ३०% आध्यात्मिक स्तरके नीचे है और नामजप २५ % के […]
धर्मप्रसारसे साधकोंंकी ही नहीं, अपितु संतोंकी भी द्रुत गतिसे प्रगति होती है और वे मोक्षकी ओर अग्रसर होते हैं। संतों और गुरुओंमें जो संत गुरु पदपर आसीन हो धर्मप्रसारकी सेवा करते हैं उनकी प्रगति अन्य संतोंकी अपेक्षा अधिक होती है – तनुजा ठाकुर
मृत्योपरांत हमारे साथ सूक्ष्मतम वस्तु ही जा सकती है। साधना सूक्ष्मतम है और हमारी सूक्ष्म जीवात्माके साथ सरलतासे जाती है और यह मृत्युके उपरांतकी यात्राको भी सुलभ करता है -तनुजा ठाकुर
संत लिखित साहित्य पढ़ने से हमारे कारण देह (बुद्धि) की शुद्धि होती है और बुद्धि का रूपान्तरण विवेक में होता है !-तनुजा ठाकुर
गुरुकृपायोगानुसार साधना अत्यधिक कठिन है; परन्तु एक बार किसीको इसका सूत्र समझमें आ जाए तो यह मार्ग सबसे सरल भी है ! इसका एक सूत्र है गुरुकी आज्ञाको वेदवाक्य मानकर पालन करना ! – तनुजा ठाकुर
योग एवं प्राणायाम करनेसे पूर्व यदि योग्य प्रकारसे प्रार्थना की जाए तो उसकी परिणामकारकता और अधिक सूक्ष्म रूपसे सिद्ध होती है और उसका परिणाम स्थूल एवं सूक्ष्म देह दोनोंपर ही देखे जा सकते हैं । योग एवं प्राणायामसे पूर्व इस प्रकार प्रार्थना करें । “हे अदियोगी शिव, आप ही हमसे योग एवं प्राणायामका यह सत्र […]
हमारा सब कुछ हमारे श्रीगुरुका है एवं श्रीगुरुका सर्वस्व मेरा नहीं अपितु गुरुकार्य हेतु है ! गुरु हमें जो भी देते हैं उसका सदुपयोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि हेतु नहीं अपितु गुरुकार्य हेतु करनेवाला साधक कहलाता है ! साधकका कोई अधिकार नहीं होता, मात्र कर्त्तव्य होता है ! साधक किसी भी परिस्थितिमें गुरु या ईश्वरसे कोई […]
कुछ साधक यह नहीं समझते कि अध्यात्म, मात्र गेरुआ वस्त्र धारण करना नहीं है, मनको साधना, ही साधना है । एक सन्यासीने मुझे पत्राचार कर पूछा है कि इतने वर्ष सन्यास दीक्षा लेनेके पश्चात भी उन्हें इतना कष्ट क्यों है ? उन्होंने लिखा है कि अब वे साठ वर्षके हो गए हैं, अब वे स्वयंको […]
कलिकाल में ईश्वरप्राप्ति हेतु देहधारी सद्गुरु परम आवश्यक ! ऐसा क्यों ? प्रसार के दौरान श्रीगुरु ने अनेक साधक, उन्नत एवं संतोंसे मिलने का सौभाग्य दिया और उस दौरान हुए अनुभव मुझे भान हुआ कि बिना गुरु कम से कम कलि काल में शीघ्र गति से अध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं ! कलिकाल में अनिष्ट शक्तियों […]