कलियुगी जीवको मात्र अपने सांसरिक लाभ और अपने प्रारब्धके कष्टको बिना स्वत: श्रम किए उसे दूर करनेवाले बाबाजी चाहिए परिणामस्वरूप उन्हें संत, योगी और सिद्ध पृरुष नहीं मिलते और जो मिलते वे उन्हें ठग लेते हैं, ध्यान रहे आपकी आध्यात्मिक पात्रता अनुरूप ही आपको अध्यात्मविद मिलते हैं !-तनुजा ठाकुर
‘भक्ति करे कोई सूरमा’ अर्थात भक्ति करना यद्यपि अत्यंत सरल साधना मार्ग है तथापि प्रत्येक यह नहीं कर सकता; अतः कबीर दासजी ने कहा है कि कोई सूरमा अर्थात क्षात्रवीर ही भक्ति कर सकता है, जिस प्रकार सोना अग्निमें तपकर कुंदन बनता है, वैसे ही जीवनकी प्रतिकूल परिस्थितियां, भक्तके भक्तिकी खरी कसौटी होती है । […]
कलियुगमें शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति हेतु गुरुकृपायोगका विहंगम मार्ग सर्वोत्तम है | इस मार्गके अनुसार शीघ्र प्रगति क्यों होती है ? क्योंकि इस योगमार्गमें अनेक योग मार्गोंकी साधना समाहित होती है | जैसे गुरुकृपायोगसे साधना करनेवाले खरे अर्थमें …….
श्रृंगार-युक्त शब्द प्रयोग, कोरा पांडित्य और दिखावटी स्तुतिसे कोई ढोंगी गुरुका चेला बन सकता है, आत्मज्ञानी व्यक्तिकी कृपा प्राप्त नहीं कर सकता है | यदि हमें पता चले कि कोई अध्यात्मविद संत हैं, तो मनसे किया नमन उन तक पहुंचता है; और हमारा उनके प्रति निरपेक्ष प्रेम, उनकी आज्ञाका पालन कर, साधना करना और उनके […]
एक देहाती कहावत है, “बाढे पूत पिताके धरमे और खेती उपजे अपने करमे” अर्थात माता-पिताद्वारा किया हुआ धर्माचरणका प्रभाव संततिपर अवश्य ही पडता है और खेतीके लिए पुरुषार्थ आवश्यक है । आजकल माता-पिता स्वयं साधना नहीं करते और न ही धर्माचरण करते हैं, उसके विपरीत पैशाचिक प्रवृत्तिवाले पाश्चात्य संस्कृतिका अंधानुकरण करते हैं और तत्पश्चात अपने […]
संतोने कठोर साधना कर गुरुकृपा प्राप्त की होती है | परंतु कुछ तथाकथित भक्तोंको लगता है कि संतोंको मात्र प्रणाम करनेसे उन्हें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा ! ध्यान रखें संतोंके दर्शन कर भावपूर्ण नमस्कारसे मात्र २% (अर्थात नगण्य समान ) उनकी कृपा प्राप्त होती है ! और उनके कार्यमें तन, मन धन, बुद्धि और […]
उपदेशककी वाणीमें चैतन्य ही समाजको प्रत्यक्ष कृति करने की और सुधरनेकी प्रेरणा देता है यदि उपदेशकके वाणीमें चैतन्य न हो तो वह कितना भी प्रयास करे, समाज इस कानसे उसके उपदेशको सुनकर दूसरे कानसे निकाल देगा ! अतः जो समाजमें कुछ सुधार चाहते हैं वे अपनी साधनाको बढानेको प्राथमिकता दें ! जिनकी करनी और कथनीमें […]
‘द्रष्टा दृश्यावसात बद्ध’ अर्थात देखने वाला दृश्य देखकर बद्ध हो जाता है और उसे उस दृश्य से संबन्धित विचार आते हैं | जैसे गर्मी के मौसम में आम को देखकर आम खाने का विचार सहज ही आता है वैसे ही अश्लील चित्र, गाने, जालस्थान, चित्रपट इत्यादि देखकर मन में काम वासना के विचार प्रबल हो […]
कुछ साधक पचास प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरपर होनेपर भी कर्मकांडकी साधना करते हैं और वह भी शास्रोक्त पद्धतिसे नहीं करते हैं और न ही उसे करते समय उनमें भाव होता है ! ऐसेमें उन्हें, उस साधनाका अपेक्षित लाभ नहीं होता | इस सन्दर्भमें एक उदहारण देती हूं, दिल्लीके एक पत्रकारसे……
खरे अर्थोंमें मात्र वैदिक सनातन धर्ममें पारंगत आत्मसाक्षात्कारी संत ही सूक्षमतम एवं गूढ अध्यात्मशास्त्रकी शिक्षा दे सकते हैं शेष तो सब अध्यात्मका दूकान खोल अपने पाप कर्मको बढ़ावा देते हैं |-तनुजा ठाकुर