अध्यात्म एवं साधना

साधक मात्र साधक होता है, स्त्री या पुरुष नहीं होता !


पुरुष साधक जब ‘उपासना’के आश्रममें आते हैं तो उनमेंसे अनेक, आरम्भमें वे अत्यधिक अस्वच्छ एवं अव्यवस्थित रहते हैं, उन्हें हमें स्वच्छ एवं व्यवस्थित रहने हेतु बार-बार कहना पडता है । एक बार इसी क्रममें एक पुरुष साधकको जब हम इस विषयमें दृष्टिकोण दे रहे थे तो उन्होंने कहा, “स्वच्छता और व्यवस्थितता स्त्रियोंका गुण है, वह हममें नहीं आ सकता ।”….

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तेरा तुझको अर्पण


मेरे आराध्य, भगवान शिवकी मुझ अधमपर सदैव ही बडी कृपा रही है, मुझे सदैव, उन्होंने मेरी पात्रतासे अधिक दिया है और क्षमतासे अधिक सर्व करवा कर लिया है, इस हेतु मैं उनकी कृतज्ञ हूं | अभी तक उन्होंने जो भी दिया है, उसे उन्हींको साक्षी मानकर, उनके श्रीचरणोंमें सदैव ही अर्पित करनेका प्रयास करती रही हूं…..

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ध्यानकी साधना हेतु कुछ आवश्यक घटक


आजकल अनेक लोग कहते है कि ध्यान करते समय उनका मन एकाग्र नहीं हो पाता है एवं ऐसा क्यों हो रहा है ? यह उन्हें समझमें नहीं आता है । ध्यानकी साधना हेतु तीन घटकोंका होना अति आवश्यक है । ध्यान हेतु प्रथम घटक हैं – जिस वास्तुमें हम ध्यान करते हैं वह सात्त्विक एवं […]

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आध्यात्मिक स्तरके मापदण्ड जान लें !


कुछ लोग हमसे अपना आध्यात्मिक स्तर जानना चाहते हैं तो अपने स्तर जाननेका एक सरलसा सिद्धान्त समझ लें ! व्यष्टि साधनाके साथ ही आपमें राष्ट्र एवं धर्मकार्य हेतु निष्काम भावसे अपने तन, मन, धन एवं कौशल्यको त्याग करनेकी वृत्ति जितनी अधिक होगी, आपका आध्यात्मिक स्तर उतना ही अधिक होगा एवं आपमें ईश्वरप्राप्ति या साधनाके प्रति […]

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अनासक्त होनेपर सुख-दुःखकी अनुभूति नहीं होती


सुख और दु:खकी अनुभूति विषयोंमें आसक्तिके कारण होती है, जो साधना कर अपने षडरिपुपर विजय प्राप्त कर लेते हैं उनका मन चाहे संसारकी माया रूपी बगियामें हो या पर्वतकी कन्दराओंमें, वह स्थिर ही रहता है । यथार्थमें माया बुरी नहीं है, मायासे आसक्ति बुरी होती है; अतः आसक्ति नष्ट हो जानेपर मायाके प्रलोभन मनको अस्थिर […]

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साधनाकी सर्वोच्च स्थिति हेतु लगनसे अभ्यास आवश्यक


निर्विकल्प समाधि साध्य करना, यह प्रत्येक साधकका लक्ष्य होता है और यह देहधारी जीवके लिए प्राप्त होनेवाली सर्वोच्च अवस्था होती है । इसे प्राप्त करने हेतु साधकमें मुमुक्षु एवं शिष्यके सर्व गुण होने आवश्यक हैं । इस स्थितिको साध्य करने हेतु अर्जुन समान एकाग्रचित्त होकर अपने लक्ष्यके प्रति पूर्ण समर्पित होकर अखण्ड साधनारत रहना पडता […]

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स्मरण शक्ति बढाने हेतु औषधि नहीं अपने मनके विकारोंको करें दूर !


जब हमारी विचार-प्रक्रिया स्थूल स्तरकी होती है तो समस्याओंका समाधान भी स्थूल होता है । विवेक जागृत होनेपर ही विचार चिन्तनमें परिवर्तित होता है और किसी भी समस्याका हम सूक्ष्म उपाय ढूंढ पाते हैं; इसलिए जबतक हममें यह क्षमता निर्माण न हो तबतक किसी गुरु या अध्यात्मविदके मार्गदर्शन अनुसार उपाय योजना क्रियान्वित करनी चाहिए । […]

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साधको ! साधनाके शस्त्रोंसे स्वयंको सदैव रखें सज्ज !


यदि आप किसी मिस्त्रीको कार्य हेतु बुलाएं और वह बार-बार अपने उपकरण (औजार) लेकर न आए तो आप उसे क्या कहेंगे ? अनके जिज्ञासु या साधक भी जब आश्रममें आते हैं तो वे न ही जपमाला लेकर आते हैं, न ही अपने साथ स्वभावदोषकी ‘डायरी’ या अन्य कोई अभ्यास-पुस्तिका और लेखनी (कलम) लेकर आते हैं […]

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व्यसनाधीनता ईश्वरसे करती है, हमें दूर !


  ईश्वर निर्व्यसनी हैं; अतः यदि हमें ईश्वरसे एकरूप होना है तो हममें भी किसी भी प्रकारका व्यसन नहीं होना चाहिए । व्यसन अर्थात ऐसी कोई वस्तुके प्रति आसक्ति जिसके न मिलनेपर मन व्याकुल हो जाता है एवं जिसके सेवनसे स्वास्थ्यको हानि पहुंचती है । मद्य, बीडी, गुटका, हुक्का, सिगरेट, मादक पदार्थ (ड्रग्स) एवं यहांतक […]

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ७)


नामजप सकाम या निष्काम किसी भी उद्देश्यसे किया जाए, वह अवश्य ही फलदायी होता है, जैसे सकाम नामस्मरणसे इच्छित कार्य होता है या उस देवताकी कृपा होती है; परन्तु निष्काम नामस्मरणसे नामधारक ब्रह्म तत्त्व या ईश्वरसे एकरूप होता है एवं सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान परमेश्वर निष्काम भक्तका एक माता समान पालन पोषण एवं रक्षण करते हैं, […]

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