स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया करनेसे अन्तर्मुखतासे वृद्धि होती है, इससे हमें ज्ञात होता है कि हम ईश्वरसे इतने दूर क्यों है ? उपासनाकी साधिका, जो बहुत ही उत्साह एवं प्रमाणिकतासे यह प्रक्रिया कर रही हैं, उन्होंने बताया कि मुझे ज्ञात हो गया है कि ईश्वरने मुझपर अभी तक अपनी कृपादृष्टि क्यों नहीं बरसाई ? मैं तो […]
साधनाका एक अर्थ है, मनको साधना । मन अर्थात अनेक जन्मोंके संस्कारोंका (विचारकेन्द्रोंके पुंज) । ये भिन्न संस्कार ही अहंके लिए कारणीभूत होते हैं और जीवको मायाके जालमें बद्ध करते हैं । संस्कारोंको नष्ट करने हेतु शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक स्तरपर प्रयास करने होते हैं । वर्तमान कालमें सामान्य व्यक्तिकेके सात्त्विकता निम्न स्तरपर पहुंच चुकी […]
षड्गुणयुक्त (श्री, यश, ऐश्वर्य, धर्म, ज्ञान, वैराग्य) ईश्वरसे एकरूप होने हेतु साधकको अपने षड्रिपुओंका (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर) र्निमूलन करना अति आवश्यक होता है । जैसे तेल और जलका मिलना तब तक संभव नहीं जब तक दोनोंमेंसे किसी एकका दूसरेके अनुरूप न हो जाए वैसे ही षड्रिपुओंसे युक्त साधकका ईश्वरसे एकरूपता तभी सम्भव […]
कुछ व्यक्ति जो एक-दो बार उपासनाके आश्रममें आ चुके होते हैं वे मुझे संगणकीय संपत्रद्वारा (ई-मेल द्वारा) या दूरभाषके माध्यमसे अपने प्रश्न नित्य पूछते रहते हैं । उनमें जिज्ञासा तो होती हैं; किन्तु वे अपनी जिज्ञासाको दूर करने हेतु जो पुरुषार्थ करने चाहिए वे नहीं करते हैं, जैसे कल ही एक व्यक्ति, श्री अरुण कुमारने […]
भोजनके सम्बन्धमें तीव्र रुचि-अरुचिके (पसन्द-नापसन्दके) संस्कारोंको न्यून करने हेतु प्रार्थनाएं …….
साधकों ! विदेश भ्रमण करनेके स्थानपर तीर्थक्षेत्र या आश्रम जाकर समयका सदुपयोग करें ! कुछ धनाढ्य साधक भ्रमणका आनन्द लेने हेतु विदेश जाते हैं, ऐसे साधकोंको सूचित कर दूं कि यदि इसके स्थानपर आप भारतमें ही किसी धार्मिक स्थलपर जाएंगे तो वह अधिक उपयुक्त होगा, इसके कारण निम्न हैं – विदेशमें अधिकांश नहीं वरन् १००% […]
संन्यास लेनेकी न कोई आयु होती है, न कोई अवस्था, जिस भी समय मनमें तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो जाए संन्यास ले लेना चाहिए; यदि संन्यासी विरक्त मनको योग्यसद्गुरुकी शरण मिले तो वह ‘सोने पे सुहागा’ हो जाता है । खरे अर्थोंमें एक सत्शिष्य यदि गुरुसेवा एवं ईश्वर प्राप्ति हेतु अपने घर, पत्नी या पति, बच्चे […]
सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेकी प्रक्रिया सीखने हेतु आनेवाले लोग जिज्ञासा दिखाते हैं; किन्तु उस हेतु योग्य पुरुषार्थ नहीं करना चाहते हैं…
साधको ! साधना अपने अहंके पोषण हेतु नहीं; अपितु अहंको नष्ट करने हेतु करते हैं, यह महत्त्वपूर्ण घटक सदैव ध्यानमें रखें ! अपने अहंके लक्षणोंके ऊपर अत्यन्त सतर्क रहें ! -तनुजा ठाकुर
एक साधकको बेसनके पदार्थका सेवन करना वैद्यने वर्जित किया था; किन्तु पथ्यके रहते हुए, वह मात्र अपनी जिह्वाकी तृप्ति हेतु अल्पाहारमें आवश्यकतासे अधिक प्रमाणमें बेसनके पकौडे ग्रहण कर रहा था, वहीं एक दूसरे साधकने उसे ऐसा करते हुए देखा जिन्हें उनके पथ्यके विषयमें जानकारी थी, तब भी उन्होंने उसे नहीं रोका, यद्यपि उन दोनों साधकोंके […]