मैंने उस साधकको उपहास करनेके लिए इसलिए मना किया था; क्योंकि उनके मनमें सदैव यही विचार रहता था कि किसी भी प्रसंगमें कुछ ऐसा बोला जाए कि सब हंस पडे…..
विदेशमें रहनेवाले उच्च स्तरके हिन्दुओंको इतना अधिक कष्ट है कि वे ५०% आध्यात्मिक स्तर होनेपर भी नियमित नामजप नहीं कर पाते हैं । यह मैंने विदेश धर्मयात्राके मध्य स्पष्ट रूपसे पाया । कुछ युवा साधक जिनका आध्यात्मिक स्तर ५०% के लगभग था, वे मुझसे दुःखी होकर कहते थे कि जब तक आपका सान्निध्य मिलता है […]
विदेशमें रह रहे कुछ हिन्दुओंको लगता है कि वे प्याज-लहसुन, मांसाहार इत्यादिका सेवन नहीं करते हैं या मदिरापान नहीं करते हैं तो यही बहुत बडी साधना है । वस्तुतः प्याज-लहसुनसे हमारे शरीरमें रजोगुण मात्र बीस मिनटके लिए एक लक्षांश बढ जाता है और उसी प्रमाणमें मांसाहार करनेपर तमोगुण बढ जाता है । हिन्दू धर्म एक […]
हिन्दुओ ! नये देवालयोंका (मन्दिरोंका) निर्माण करनेसे पूर्व आपके आस-पासके देवालयोंके योग्य प्रकारसे रख-रखाव, पूजा-अर्चना हो रही या नहीं, यह अवश्य देखें ! आपके निकटके क्षेत्रका देवालय उपेक्षित पडा हो और आप नूतन मन्दिरका निर्माण कर रहे हों, तो इसमें कोई बडप्पन नहीं है । अपने क्षेत्रके उपेक्षित पडे मन्दिरको धर्मशिक्षणस्थल बनाकर, अपने नेतृत्व गुण […]
खरे अर्थोंमें विद्या हमारी बुद्धि और विवेकको जागृत कर हममें पात्रता निर्माण कर हमें मुक्ति प्रदान करती है, इसलिए कहा गया है ‘सा विद्या या विमुक्तये’; परन्तु आजकी मैकालेकी आसुरी शिक्षण पद्धतिने हमे योग्य और अयोग्यके मध्यका भेद भी समझने योग्य नहीं रहने दिया है, तभी तो कभी सत्त्व प्रधान रही इस भारतीय संस्कृतिमें जन्म […]
कलियुगमें ईश्वरके निराकार स्वरुपको माननेवाले अनेक पन्थोंका जन्म हुआ, वैसे तो निराकार स्वरुपकी आराधना वैदिक धर्मसे सदैवसे ही होती आ रही है, वस्तुत: सत्ययुगमें समाजकी सात्त्विकता अधिक होनेके कारण एवं धर्मके चारों पाद विद्यमान होनेके कारण निराकार स्वरुपकी ही आराधना की जाती थी । जैसे-जैसे युगोंका प्रवाह हुआ एवं धर्मके भिन्न चरणोंके क्षरण हुए वैसे-वैसे […]
यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर निर्मित है; अतः नामजप कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्थितिमें किया जा सकता है | नामजप मनसे किया जाता है अतएव उसमें किसी प्रकारका बंधन लागू नहीं होता | पद्म पुराणमें कहा गया है न देशनियमस्तस्मिन् न कालनियमस्तथा । नोच्छिष्टेऽपि निषेधोऽस्ति श्रीहरेर्नामिन् लुब्धक ।। अर्थात् श्रीहरिके नाम-कीर्तनमें न तो किसी […]
जैसे दूध, दही या मलाईको (सन्तानिकाको) मथनेपर मक्खन निकलता है वैसे ही मन, बुद्धि और अहंके मंथनसे मोक्ष प्राप्त होता है; परन्तु ईश्वर या सद्गुरु जब साधकके साथ यह मंथनकी प्रक्रिया करते हैं तब उससे पीडा होती है । ऐसी स्थितिमें जो सद्गुरुके चरणोंका ध्यानकर, इस वेदनाप्रद प्रक्रियाको सहन करता है, उसे निश्चित ही ब्रह्मानन्दकी […]
अनेक व्यक्तियों लगता है कि कोई साधक आत्मसाक्षात्कारी हो गया तो उसे पूर्णत्वकी प्राप्ति हो गई; परन्तु ऐसा नहीं है, सन्तोंमें भी गुरु, सद्गुरु एवं परात्पर गुरुका पद होता है । आत्मसाक्षात्कार ७०% आध्यात्मिक स्तरपर साध्य हो जाता है, ८०% स्तरपर सद्गुरु पद एवं ९०% स्तरपर परात्पर पद साध्य हो जाता है और उसके आगे […]
अनेक व्यक्ति कहते हैं कि पहलेके युगों समान आज संत नहीं हैं, अपने पंद्रह वर्ष साधनाकाल और भ्रमणमें मैंने हिमालय और वनोंमें नहीं अपितु समाजमें अनेक गुप्त सिद्धों, योगियों, संतों एवं गुरुओंसे मिली ही नहीं हूं उनका आशीष और कृपा भी सहज ही प्राप्त हुआ है ! प्रत्येक युगोंमें साधक,जिज्ञासु , मुमुक्षु एवं शिष्योंके लिए […]