साधको, अपनी भावनाप्रधानता रुपी दुर्गुणको शीघ्र दूर कर आगामी आपातकालकी करें पूर्व सिद्धता ! अनेक साधक अत्यधिक भावनाप्रधान होते हैं, स्वयंके जीवनमें घटित होनेवाले प्रसंगोंसे तो वे अत्यधिक व्यथित हो ही जाते हैं, अपने मित्र या परिजनको भी यदि कोई दुःख हो तो वे अवसादग्रस्त या अत्यधिक विचलित हो जाते हैं । आनेवाला काल भीषण […]
मनकी एकाग्रतामें सहायक है स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया कोई भी साधक साधना क्यों करना चाहता है ?, यदि हम इस प्रश्नका उत्तर किसी साधकसे पूछेंगे तो वह उत्तर देगा, मनकी एकाग्रता साध्य करने हेतु वह साधना करता है । अनेक साधक नामजप, ध्यान, त्राटक इत्यादिद्वारा मन एकाग्र करनेका प्रयास करते हैं, किन्तु वे अध्यात्मविदोंको बताते हैं […]
एक श्रोताने वैयक्तिक विकास गुटमें सम्मिलित होने हेतु हमें सन्देश भेजा । जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि उस गुटमें उन्हें अपनी चूकें साझा करनी होगी तो उन्होंने झटसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि इससे तो मेरी निजताका हनन होगा । आप जब तक अपने दोषोंसे निर्मित हुए चूकोंको साझा नहीं करेंगे, आपको योग्य […]
हमारे श्रीगुरुके अनुसार कलियुगमें व्यष्टि साधनाका महत्त्व ३० % एवं समष्टि साधनाका महत्त्व ७० % है और यह समीकरण कलियुगके आनेवाले ४ लाख २८ सहस्र वर्षोंतकके लिए सत्य रहेगा । इसका कारण हम आपको अनेक बार धर्मधारा सत्संगमें एवं अपनी लेखनद्वारा बता ही चुके हैं । व्यष्टि साधना करनेवाले साधकोंमें यदि कोई दुर्गुण हो तो […]
आदर्श साधक बनने हेतु करें अपना स्वभावदोष निर्मूलन जब भी साधक नियमित साधना करता है तो उससे, उसके परिवारके सदस्य, मित्र, परिजन सभी आदर्श वर्तनकी अपेक्षा रखते हैं और जब यह नहीं होता है तो वे उसकी साधनाके सन्दर्भमें व्यंग्य करते हैं, जिससे साधकका मन अशांत हो जाता है । जैसे कई बार स्त्रियां अपने […]
साधनाको संग्रहित करने हेतु करें यह प्रक्रिया जैसे एक घडेमें बहुतसे छिद्र हों और हम उसमें जल डालते जाएं तो जल कभी भी एकत्रित नहीं होगा, उसीप्रकार नामजप, सत्सेवा, त्याग, इत्यादि करनेसे जो आध्यात्मिक ऊर्जा एकत्रित होती है, वह दोषोंके कारण निर्माण होनेवाले पापकर्मके क्षालनमें नष्ट हो जाती है । साधनाके प्रयासोंसे एकत्रित आध्यात्मिक शक्ति, […]
जबतक किसी साधकका आध्यात्मिक स्तर ८० प्रतिशत नहीं हो जाता है, तब तक उसकेद्वारा किए गए प्रत्येक अनुचित कर्मका फल उसे पापकर्मके रूपमें, या तो इस जन्ममें या अगले जन्ममें भोगना ही पडता है; इसलिए साधनाके कालमें साधकद्वारा जाने-अनजाने कोई बडी चूक हो जाए तो उसने उस पापके क्षालन हेतु त्वरित ही प्रायश्चित लेना चाहिए […]
कोई भी साधक साधना क्यों करता है ? यदि इस प्रश्नका उत्तर ढूंढा जाए तो इसका मुख्य कारण होगा, आनन्दकी प्राप्ति हेतु और आनन्दकी प्राप्तिमें सबसे बडे बाधक होते हैं, हमारे दोष एवं अहंकार । दोष और अहंकारका प्रमाण जितना न्यून (कम) होगा, साधक उतना ही अधिक आनन्दमें रहेगा । सन्त आनन्दमें क्यों रहते हैं; […]
ईश्वरप्राप्तिके सभी मार्गोंसे गुरुकृपायोगका मार्ग, सर्वश्रेष्ठ योगमार्ग है । इसे ईश्वरप्राप्ति या मोक्ष पानेका लघु पथ (shortcut) भी कहा जा सकता है । गुरुकी कृपा पाने हेतु हमारे श्रीगुरुने अष्टांग योगके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया है और इसके चरण इस प्रकार है – स्वभावदोष निर्मूलन, अहम् निर्मूलन, नामजप, सत्संग, सेवा, त्याग, भाव-जागृति और प्रीति । इन […]
साधनाका मूल उद्देश्य होता है त्रिगुणातीत होकर उस निर्गुण निरकार ईश्वरसे एकरूप होना । त्रिगुणातीत होने हेतु आरम्भमें अपने सत्त्व गुणको बढाना एवं रज-तम गुणोंको न्यून (कम) करना अत्यन्त आवश्यक होता है । हमारे स्वभाव दोष वस्तुत: हमारे भीतर रज-तमके संस्कारोंका प्रकटीकरण होते है; ईश्वरप्राप्ति हेतु इच्छुक साधकोंने इस प्रक्रियाको नियमित एवं प्रमाणिकताके साथ करनेका […]