दोष : अनुशासनहीनता अन्तर्गत समयबद्धताका अभाव अव्यवस्थिताके कारण नहीं समयबद्ध रह पाना मैंने ऐसा पाया है कि जिनमें समयबद्धताका अभाव होता है, उनमें पूर्व नियोजनका अभाव तो होता ही है, वे अत्यधिक अव्यवस्थित भी रहते हैं; फलस्वरूप उनका समय वस्तु ढूंढनेमें भी व्यर्थ होता है । जैसे घर आनेपर वाहनकी कुंजी(चाभी) यथास्थान न रखना एवं […]
दोष : अनुशासनहीनता अन्तर्गत समयबद्धताका अभाव एक सुप्रसिद्ध कहावत है चोर-चोर मौसेरे भाई । उसीप्रकार हमारे गुण-दोष होते हैं । एक गुण अपने साथ अनेक गुणोंको आकृष्ट करता है एवं एक दोष अनेक दोषोंको जन्म देता है या अन्य भिन्न दोषोंकी वृद्धिमें सहायक होता है। तो आज हम समयबद्धता इस गुणमें किस प्रकार पूर्व नियोजनकुशलता […]
अनुशासनहीनता भारतमें अनेक लोगोंमें समयबद्धता अर्थात् यथोचित समयपर सभी कृति करना, यह गुण नहीं होता, अतः यदि कोई कार्यक्रम सात बजेसे हो तो लोग आठ बजेसे आना आरम्भ करते हैं और कार्यक्रम नौ बजे आरम्भ होता है। यह आप सभीने अनुभव किया ही होगा। अनेक बार जब हम किसी विशिष्ट अथितिको अपने कार्यक्रम हेतु आमंत्रित […]
अनुशासनहीनता अपने अनुशासनहीनताको दूर करने हेतु सर्वप्रथम यह स्वीकार करें कि मुझमें अनुशासनहीनता, यह दुर्गुण है | जब तक हम यह स्वीकार नहीं करते हैं कि हमारे व्यक्तित्वमें यह दुर्गुण है तबतक स्वयंमें सुधार करना कठिन होता है; अतः अंतर्मुख होकर अपने दोषको स्वीकार करना, यह स्वयंमें सुधार लानेका प्रथम चरण है । हमारे भीतर […]
अनुशासनहीनता अपने अनुशासनहीनताकी सर्व व्याप्ति अपनी स्वाभावदोष पुस्तिकामें लिखें एवं उसमें जिससे समष्टिको सर्वाधिक कष्ट होता है उसे दूर करनेका प्रयास करें ! अनुशासनहीनताकी व्याप्ति ऐसे लिखें – १. दोपहिए वाहनकी कुंजी(चाभी) यथास्थानपर नहीं रखी । २. स्नान करनेके पश्चात स्नानगृहकी बत्ती नहीं बुझाई और जालीके केश स्वच्छ नहीं किये । ३. अपने बिछावन प्रातः […]
अनुशासनहीनता अपने स्वाभावदोष, अनुशासनहीनताको दूर कर समष्टिके बनें प्रिय पात्र ! अध्यात्ममें शीघ्र प्रगति हेतु एक अति आवश्यक गुण है अनुशासनबद्धता । जो साधक आश्रममें रहते हैं, उन्होंने कार्यपद्धतिका पालन करना चाहिए, यह भी अनुशासनबद्धताका ही भाग है और जो गृहस्थ अपने घरमें रहकर साधना करते हैं उन्होंने अपनी दिनचर्या बनानी चाहिए एवं उसका यथासम्भव […]
अखण्ड नामस्मरण और सत्सेवासे हम अपने मनके विचारोंके आवेगको नियन्त्रित कर सकते हैं । सत्सेवा सन्तकी या धर्मप्रसारकी सेवा अर्थात् किसी सन्तके कार्यमें सहभागी हों ! इससे ईश्वरीय कृपा या गुरुकृपाका संचार होता है और मनके विकार नष्ट होते हैं ।- तनुजा ठाकुर
त्याग एवं प्रीतिका सीधा सम्बन्ध साधकत्वसे होता है, जिसमें त्याग व प्रीति (निष्काम प्रेम) जितना अधिक होता है, वह उतना ही अच्छा साधक होता है । साधक, अपने तन, मन, धन, प्राण, बुद्धि एवं अहंका त्याग अत्यन्त सहजतासे ईश्वरप्राप्ति हेतु करता है एवं प्रीतिके गुणके कारण उसमें समष्टि भाव होता है; अतः वह धर्म रक्षण […]
पिछले अनेक शतकोंसे हिन्दू, बाह्य आक्रान्ताओंके हाथों परतन्त्र होते आए हैं, इसका मूल कारण रहा है, हिन्दुओंमें एकताका अभाव । अपनी क्षुद्र स्वार्थकी सिद्धि हेतु सभी हिन्दू राजाओंने एकजुट होकर विदेश आक्रान्ताओंका सामना नहीं किया और परिणामस्वरूप उन्हें विदेशी शासकोंकी अधीनता स्वीकार करनी पडी एवं कालान्तरमें ऐसे आक्रान्ताओंके शासनकालमें अमानवीय अत्याचार सभीको सहना पडा । […]
इस प्रक्रियाको करने हेतु प्रतिदिन अपनी चूकें (गलतियां) एक अभ्यासपुस्तिकामें लिखना एवं उसे समष्टिमें साझा करना, यह स्वभावदोष प्रक्रियाका प्रथम चरण है । मात्र चूकें लिखनेसे मनके दोष न्यून नहीं होते हैं, अपितु मनको योग्य दिशा देने हेतु उसे निर्देश देने पडते हैं जिसे स्वयंसूचना कहते हैं । स्वयंसूचना अर्थात मनको यह सूचना देना कि […]