दुःख होनेपर ईश्वर या गुरुके प्रति कृतज्ञताका भाव व्यक्त होते रहनेसे कृपाका संचार त्वरित होता है और या तो दुःख भोगनेकी शक्ति निर्माण होती है या दुःखका मूल कारण ही नष्ट हो जाता है।
सर्व सामान्य व्यक्तिकी धनपर अधिक आस्था होती है इसलिए वह आपातकालके लिए धन एकत्रित करता है। साधककी ईश्वरपर अधिक आस्था होती है….
पूर्व कालमें अधिकांश पुरुष श्वेत रंगके वस्त्र धारण करते थे; सामान्य पुरुषोंके लिए अपनी वासनाओंको नियन्त्रित करना कठिन होता है, इसका उल्लेख हमारे धर्मशास्त्रोंमें अनेक स्थानोंपर है…
एक व्यक्तिने पूछा है मैं प्रतिदिन प्रातःकाल उठनेका प्रयत्न करता हूं; किन्तु आलस्यवश नहीं उठ पाता हूं एवं देरसे उठनेपर मुझे आत्मग्लानि होती है, इस हेतु मैं क्या करूं ?, यह समझमें नहीं आता है । इस हेतु आप निम्नलिखित प्रयत्न करें, सर्वप्रथम इस प्रकार स्वयंसूचनाएं लें – जब-जब मैं प्रातःकाल छह बजे उठनेका गजर […]
यदि मन एवं बुद्धिपर अनिष्ट शक्तियोंद्वारा अत्यधिक सूक्ष्म काला आवरण निर्माण किया गया हो, बुद्धिका उपयोग आवश्यकतासे अधिक हो या अहंका प्रमाण अधिक हो तथा घरमें पितृदोषका प्रमाण अधिक हो तो सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेमें अधिक समय लग सकता है ।खरा ज्ञान शब्दातीत है !
प्रेम जब वासना या इच्छारहित हो जाता है तो उसमें ईश्वरीय शक्ति आ जाती है, उसकी अनुभूति आनन्ददायक होती है और वह सम्बन्ध सांसारिक न रहकर आध्यात्मिक हो जाता है।
विवेकके नष्ट होनेपर उचित और अनुचितके मध्य भेद करनेकी शक्ति समाप्त हो जाती है और विवेककी जागृति मात्र और मात्र धर्माचरण और साधनासे ही सम्भव है!
पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंमेंसे किसी एक इन्द्रियोंको नियंत्रित करनेसे शेष इन्द्रियोंको नियंत्रित करनेकी कला आ जाती है
प्राकृतिक आपदाओंकी तीव्रता प्रत्येक वर्ष बढती जा रही है, इस बार एक साथ अनेक राज्योंमें (१३ राज्योंमें) पञ्चतत्त्वोंका प्रकोप क्रियाशील है, अब भी हिन्दू यदि संतोंकी बातको मानकर साधनाको प्रधानता न दें तो उनकी रक्षा कौन करेगा ?
अध्यात्ममें क्रियमाण कर्मका बहुत महत्त्व है, हमारे श्रीगुरुके अनुसार १ % क्रियमाण कर्मसे भी हम अपने सभी संचित कर्मोंको नष्टकर जीवनमुक्त ही नहीं हो सकते हैं अपितु मोक्षप्राप्ति भी कर सकते हैं ! जैसे एक व्यक्तिका आध्यात्मिक स्तर……..