प्रार्थना दो प्रकारकी होती है सकाम एवं निष्काम प्रार्थना । सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति हेतु की जानेवाली प्रार्थना सकाम होती है एवं ईश्वरीय कृपा या आध्यात्मिक प्रगति सम्पादन करने हेतु, राष्ट्र एवं धर्म रक्षण या धर्मप्रसारमें आनेवाली बाधाएं दूर करने हेतु….
आजसे दो शतक पूर्व तक ७०% हिन्दू धर्मभीरु थे एवं ९०% हिन्दू यद्यपि योग्य साधना नहीं करते थे; तथापि धर्माचरणका पालन तो करनेका अवश्य ही प्रयास करते थे…..
चाहे कोई जिज्ञासु किसी भी मार्गसे साधना करना चाहे या कोई साधक किसी भी योगमार्गसे साधनारत हो, दोनोंके लिए ईश्वरप्राप्ति हेतु कुछ गुणोंका होना आवश्यक होता है एवं सभी गुणोंमें सबसे आवश्यक गुण है, तीव्र मुमुक्षुत्वका होना…..
पुरुषार्थ करनेका स्थल है आश्रम : आश्रम शब्दकी व्युत्पत्ति आ+श्रम से हुई है; अतः आश्रम एक ऐसा स्थल है, जहां जाकर योग्य दिशामें श्रम या पुरुषार्थ करनेसे लौकिक एवं पारलौकिक कल्याण निश्चित ही होता है….
दसवीं और बारहवींके परीक्षा परिणाम आने लगे हैं और मुझसे जो साधक माता पिता सम्पर्कमें है, वे सभी अपने बच्चोंके परिक्षा परिणामसे प्रसन्न नहीं है, जबकि मैंने इन सभी माता-पिताको अनेक बार कह चुकी हूं….
युवाओंमें अपराधमें प्रवृत्त होनेका मुख्य कारण होते हैं उनके भिन्न स्वभावदोष : एक सर्वेक्षण अनुसार देशमें होनेवाले ७० प्रतिशत अपराधोंमें युवाओंकी संलिप्तता रहती है । बाल्यकालसे ही विद्यार्थियोंको उनके दोषोंके प्रति सतर्क रहना…..
१. कुछ व्यक्ति कहते हैं कि नामजपके लिए समय ही नहीं मिलता है, ऐसे लोग शारीरिक कार्य करते समय बोलकर या बुदबुदाकर नामजप कर सकते हैं । सामान्यत: सभी व्यक्ति तीनसे चार घंटे कोई न कोई शारीरिक कार्य तो करता ही है । यह समय वह नामजपके लिए उपयोग कर सकता है । जैसे प्रातः […]
वाणीके अनुसार नामस्मरण चार प्रकारकी होती है – वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा । वैखरी वाणीमें नामजपकी विशेषता १. प्राथमिक अवस्थाके साधकोंका नामजप वैखरी वाणीसे आरम्भ होता है । २. जब नामजप हेतु हम क्रियमाणसे प्रयत्न कर नामजप करते हैं तो इसे वैखरी वाणीका नामजप कहा जाता है । ३. इस जपको सामान्यतः उच्चारण कर […]
वर्तमान कालमें अधिकांश (८०%) घरोंमें योग्य साधना एवं धर्माचरणके अभावमें सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, ऐसेमें यदि प्रातःकाल ही घरके अधिकसे अधिक सदस्य कमसे कम आधे घण्टेतक नामजप कर लें….
साधना अत्यधिक दुःखमें नहीं हो पाती है, इसकी प्रतीति मन्दिरके समक्ष बैठे भिखारियोंसे ले सकते हैं | सम्पूर्ण जीवन देवालयके परिसरमें रहते हुए भी उनकी आध्यात्मिक प्रगति…