आजीवन अहोरात्र (दिन-रात) मात्र सांसारिक वस्तुओंको स्मरण करनेवाला व्यक्ति, मृत्युके क्षणमें, ईश्वरका नाम अनेक प्रयासकर भी नहीं ले सकता; अतः मृत्युके समय नामजप हो, इस हेतु नामजप अधिकसे अधिक समय करना चाहिए ! ध्यान रहे, ‘अन्त मति सो गति’ |
कुछ साधक स्वयं प्रेरित होकर प्रतिदन १५ या २० चूकें लिखते हैं; किन्तु यदि कोई उनकी एक चूक बता दे तो उसे वे स्वीकार नहीं कर पाते हैं; और तुरन्त प्रतिक्रिया देते हैं । ऐसे साधकोंको यह ध्यानमें रखना चाहिए कि उनमें अहंका प्रमाण अधिक है; अतः उन्होंने प्रतिदिन अपने आस-पासके सदस्योंसे चूकें पूछकर लेनी […]
एक पाठकने प्रश्न किया है, आप अपने लेखनमें एक विषयसे सम्बन्धित लेखको एक ही बार लिखकर क्यों नहीं प्रकाशित कर देती हैं, उसे छोटे-छोटे भागमें क्यों प्रकाशित करती हैं ? उत्तर : भारतमें पिछले २१ वर्षोंसे धर्मप्रसार कर रही हूं और मैंने पाया है कि यहांके लोगोंमें धर्म और अध्यात्म सीखनेकी जिज्ञासा बहुत अल्प (कम) […]
कुछ लोग कहते हैं हमारा मन एकाग्र और निर्विचार नहीं रहता है और हम जैसे अभागोंको एकाग्र अवस्थामें (या निर्विचार अवस्थामें) रहने हेतु, ईश्वरने समय ही नहीं दिया है, उस अवस्थासे बाहर आनेके लिए संकेतध्वनि (अलार्म) लगानी पडती है !
अखण्ड भावावस्था द्वैत अवस्थाकी सर्वश्रेष्ठ अवस्था होती है; किन्तु इसमें कार्य नहीं हो सकता ! कार्य करने हेतु उस स्थितिसे बाहर आना पडता है ।
वाणी अनुसार नामजप (भाग – ३) वाणीके अनुसार नामस्मरण चार प्रकारका होता है – वैखरी, मध्यमा, पश्यंती और परा । इन वाणियोंमें नामजप क्रमशः कण्ठ, ऊर्ध्व प्रदेश, हृदय और नाभिसे निसृत होता है । हम सर्वप्रथम प्राथमिक अर्थात वैखरी वाणीके जो दो प्रकार हैं उसके विषयमें जान लेते हैं – उच्च स्वरसे जो जप किया […]
एक बार गोपियोंने बांसुरीसे पूछा, “अरी बांसुरी ! तू श्रीकृष्णके होठोंसे कैसे चिपक गई ?” बांसुरीने कहा, “क्या बताऊं बहना, मैं तो बांसोंके झुण्डमें चुपचाप ‘कृष्ण-कृष्ण’ रटा करती थी….
प्रार्थना रट्टू तोते समान नहीं अपितु भावपूर्वक करें
अनेक बार हम प्रार्थना करते हैं, किन्तु यदि वह यन्त्रवत हो अर्थात् मात्र करनेके लिए किया जाए जैसे हम सब विद्यालयमें करते थे तो उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता…..
निष्काम प्रार्थना करनेसे ईश्वरीय कृपा सम्पादित होती है और वर्तमान कालमें हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना निमित्त की गई प्रार्थना कालानुसार साधना होनेसे यह हमारी आध्यात्मिक प्रगति हेतु भी पोषक है….
कुछ धर्मनिष्ठ वृद्ध हिन्दुत्ववादियोंको लगता है कि अब उनका शरीर दुर्बल हो गया है; अतः वे अब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना निमित्त कुछ नहीं कर सकते हैं, वैसे ही कुछ स्त्रियोंको जिन्हें समष्टि कार्य करनेमें उनके परिवारके लोग विरोध करते हैं….