अध्यात्म एवं साधना

आश्रमका महत्त्व (भाग – ९)  


साधनाके भिन्न दृष्टिकोण सीखने हेतु आश्रम जीवन व्यतीत करना आवश्यक : आश्रममें रहनेसे सेवाके मध्य हमें साधनाके सूक्ष्म दृष्टिकोण सीखनेको मिलते हैं; अतः ऐसे दृष्टिकोणोंको यदि व्यावहारिक जीवनमें भी उतारा जाए तो व्यक्तिके भीतर दिव्यता शीघ्र निर्माण होने लगती है …..

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आश्रमका महत्त्व (भाग – ८)  


आश्रम जीवनद्वारा चारों वर्णोंकी साधना भी है सम्भव : आश्रममें चारों वर्णकी साधना सहज ही होती है, समाजको धर्मशिक्षण देने हेतु साधक अपनी योग्यता अनुरूप बुद्धिका उपयोग कर सेवा करते हैं; अतः ब्राह्मण वर्णकी साधना होती है….

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धर्मधारा


भगवद्भक्ति करने हेतु निश्छल प्रेमके अतिरिक्त और कुछ भी आवश्यक नहीं । भक्ति सभी कर सकते हैं, यह सर्व प्राणी मात्रके लिए सहज ही प्राप्य है एवं निष्काम भक्तिसे प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवानने अपने….

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आश्रमका महत्त्व भाग – ७


समयका और मनुष्यके अनमोल जीवनका महत्त्व समझने हेतु आश्रममें व्यतीत करें, कुछ दिवस : आश्रममें हमारी साधनापर प्रत्येक क्षण दृष्टि रखी जाती है; अतः यहां एक भी पल व्यर्थ नहीं जाता; अतः मनुष्य जीवनमें समयका महत्त्व क्या है एवं उसकी सार्थकता कैसे सिद्ध कर सकते हैं ?, यह सीखते हैं । आज अधिकांश व्यक्ति ‘फेसबुक’, […]

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आश्रमका महत्त्व भाग – ६


सात्त्विक जीवन प्रणाली क्या है ?, यह सीखनेका उत्तम स्थल है आश्रम : वर्तमान कालमें धर्म शिक्षणके अभावमें अधिकांश हिन्दुओंकी जीवन शैली रज-तम प्रधान हो चुकी है; किन्तु आज भी सन्तोंके आश्रममें सात्त्विक जीवन प्रणालीका अनुसरण किया जाता है, इससे एक सर्व सामान्य व्यक्ति सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे व्यतीत करना चाहिए ?, यह सीखता है; […]

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आश्रममें आकर रहनेका महत्त्व (भाग – ५)


ईश्वरीय चैतन्यका स्रोत है आश्रम : आश्रम ईश्वरीय चैतन्यका स्रोत होता है; क्योंकि वहां सन्त, गुरु, देवी-देवताओंका स्थूल वास तो होता ही है, सन्त परम्परामें जितने भी गुरु हुए हैं, उन सबका सूक्ष्म अस्तित्त्व एवं आशीर्वाद भी होता है । इसका परिणाम वहां जाकर कुछ दिवस सेवा करनेसे प्राप्त होने लगता है ।

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आश्रमका महत्त्व (भाग – ४)


दूसरोंका विचार करते हुए कैसे रहना चाहिए ?, यह आश्रम जीवनसे सीखा जा सकता है : आश्रममें दूसरोंका विचार कैसे करना चाहिए ?, यह सिखाया जाता है और इससे अहम् न्यून होता है और व्यक्तिके मानवीय मूल्योंमें वृद्धि होती है, फलस्वरूप जब व्यक्ति यह गुण सीखकर उसे अपने जीवनमें आत्मसात करते हैं और इससे वह […]

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धर्मधारा


सभी मर्यादाओंके परे, परमेश्वर स्वरूपी कृष्णसे एकरूप होने हेतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम समान प्रथम आचरण करना पडता है । जैसे कालातीत होने हेतु कालके महत्त्वको समझकर कार्य करना पडता है, त्रिगुणातीत होने हेतु प्रथम सात्त्विक बनना पडता है । एक चरणको साध्य करनेपर ही दूसरे चरणमें हमारा प्रवास होता है ।

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एक साधे सब सधे


इस संसारके प्रत्येक व्यक्तिको कोई भी प्रसन्न नहीं कर सकता है; किन्तु संसारके रचयिता, परम पिता परमेश्वरको अपने क्रियमाण कर्मके द्वारा अर्थात साधनाद्वारा प्रसन्न किया जा सकता है । और वे प्रसन्न हो जाएं तो सर्व जगत स्वयं ही प्रसन्न हो जाता है अर्थात एक साधे सब सधे !

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अनिष्ट शक्तियोंके कष्टके निवारणार्थ योग्य उपाययोजना करना है अति आवश्यक


कुछ साधकोंको अनिष्ट शक्तियोंके कष्टके निवारणार्थ जो भी नामजप एवं आध्यात्मिक उपाय बताए जाते हैं, उसे वे नियमित नहीं करते हैं एवं अपने कष्टोंका रोना रोते रहते हैं….

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