अध्यात्म एवं साधना

आश्रमका महत्त्व (भाग – ३)


प्रेम और अनुशासनके मध्यका सामञ्जस्य सीखनेका उत्तम स्थल है आश्रम : आश्रम एक ऐसा स्थान होता है जहां प्रेम एवं अनुशासनका सुन्दर संगम होता है । इन दोनों गुणोंका अन्यत्र कहीं ऐसा संगम देखनेके लिए नहीं मिलता है…

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दैनिक वृत्त


दैनिक वृत्त पत्र पढने हेतु नीचे दिए गए लिंकपर जाएं, इसमें आपको पूज्या तनुजा ठाकुरके सुवचन, भिन्न चिकित्सा पद्धतिसे सम्बन्धित लेख इत्यादि पढने हेतु मिलेंगे ! अबसे हम ऐसे सुवचन दैनिक वृत्तमें ही प्रसारित करेंगे । दैनिक वृत्त पत्र पढने हेतु इस लिंकपर जाएं : https://vedicupasanapeeth.org/hn/दैनिक-वृत्त

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आश्रममें रहनेका महत्त्व (भाग – २ )  


आश्रम कर्मयोगकी शिक्षा देनेवाला एक प्रत्यक्ष स्थल – आश्रममें रह रहे सन्तसे लेकर साधकतक सभी निष्काम भावसे कर्मरत दिखाई देते हैं । इतना ही नहीं, वे यह सब कर्म ईश्वरको कर्तापन अर्पण कर करते हैं; अतः आश्रममें कर्मरत सन्त एवं साधकके मुखपर दैवी कर्मका तेज स्पष्ट परिलक्षित होता है; अतः यदि आलस्यका त्याग करना हो […]

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कलियुगी साधकोंकी वस्तुस्थिति


यदि कोई युवती अपने प्रेमीसे विवाह कर नया घर बसाती है और कुछ दिवस पश्चात उसे ज्ञात होता है कि विवाह उपरान्त जिस जीवनका वह स्वप्न देखती थी, वह तो अत्यन्त मधुर था और यह यथार्थ अत्यन्त कटु है….

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नामजपकी महिमामण्डन


नामजप कल्पतरु है । उससे भक्त जो चाहता है, वह प्राप्त होता है । ऐसा कोई कार्य नहीं जो भगवानके नामके आश्रय लेनेपर न हो ! ऐसा कोई पदार्थ या स्थिति नहीं, जिसे नामका आश्रय दिला न सके !; इसलिए नामका आश्रय लेकर किसी सांसारिक कामनाका पोषण न करके संसारके आवागमनसे मुक्ति एवं भगवानसे एकरूपताकी […]

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सुख और विद्याका एक साथ संगम सम्भव नहीं !


सुख चाहनेवालेसे विद्या दूर रहती है और विद्या चाहनेवालेसे सुख; इसलिए जिसे सुख चाहिए, वह विद्याको छोड दे और जिसे विद्या चाहिए, वह सुखको त्याग दे…..

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धर्मधारा


एक स्त्री साधिकाने कहा, ‘‘आपने मेरे पतिका आध्यात्मिक स्तर ५०% बताया है; किन्तु उनकी एक कृति उनके आध्यात्मिक स्तर अनुरूप नहीं दिखाई देती है !’’  मैंने कहा, “आपको ही क्यों, मुझे भी बहुत आश्चर्य होने लगा था…..

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धर्मधारा


आध्यात्मिक प्रगति हेतु समर्पण एक अति आवश्यक गुण होता है और यह एक स्त्री सुलभ गुण है इसलिए एक पुरुष सन्त इस गुणको शीघ्र आत्मसात करने हेतु कुछ दिवस स्त्रियों समान वेश धारण कर, इस गुणको आत्मसात कर भक्ति करने लगे थे |  वे आजके कुछ व्यभिचारी भांड समान नहीं थे वे, जो मात्र ओछी […]

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व्यष्टि और समष्टि साधनाका समन्वय


मेरे लेखोंके एक पाठकने पूछा है कि जब अध्यात्म और साधना सम्बन्धित लेख पडता हूं तो मनको आनन्द और शान्तिका अनुभव होता है; परन्तु जब सामाजिक जागृति  सम्बन्धित आपके लेख पढता हूं तो उससे क्षात्रवृत्तिकी भावना जागृत हो जाती, आप अपने लेखोंमें इतना विपरीत भाव कैसे ला पाती हैं ? उत्तर : सब कुछ हमारे […]

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साधक किसे कहते हैं ?


जब कोई स्वयंप्रेरित होकर नियमित तन, मन, धन, बुद्धि और अहंका त्याग करता है अर्थात् जो उसके पास हो उसका त्याग, निष्काम भावसे, मात्र ईश्वरीय कृपा सम्पादन करने हेतु सातत्यसे अनेक वर्षतक, बिना किसी बाह्य प्रोत्साहनके, साधनारूपमें करता है, उसे ‘साधक’ कहते हैं । जबतक साधनाके इस मापदण्डमें उतार चढाव आता रहे और उसे समय-समयपर […]

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