स्वाभाव दोष निर्मूलन प्रक्रिया आरम्भ करनेवाले एक व्यक्तिने कहा कि आज मैं सतर्क था; इसलिए मुझसे कोई चूक नहीं हुई ! कलियुगमें लोगोंमें दोष और अहंका प्रमाण इतना अधिक है कि एक सर्व सामान्य व्यक्तिसे दिनभरमें लगभग २०० चूकें होती हैं…
अनके बार जब किसी सन्तका देह त्याग होता है तो समाचारपत्रमें जो वृत्त प्रकशित होते हैं, उसमें निधन या मृत्यु शब्दका प्रयोग होता है । सन्तोंका निधन या मृत्यु नहीं होती है, उनका देह त्याग होता है । ऐसा क्यों…
आश्रमका दिव्य प्रसाद ग्रहण करना है बडे सौभाग्यकी बात : आश्रमका ‘महाप्रसाद’ चैतन्यसे आवेशित होता है और किसी भी लोकमें नहीं प्राप्य नहीं होता है । तभी तो देव, ऋषि, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व सब वेश परिवर्तितकर आश्रमका ‘महाप्रसाद’ ग्रहण करने आते हैं; इस दैवी प्रसादको ग्रहण करनेसे स्थूल देह एवं मनोदेहकी शुद्धि होती है और […]
‘प्रीति’, इस गुणको आत्मसात करनेका एक उत्तम स्थल है आश्रम : किसी भी सन्तके आश्रममें सभी भेदभाव भूलकर प्रेमसे कुटुम्ब भावनासे रहते हैं, ऐसेमें प्रीति, जो साधनाका एक महत्त्वपूर्ण चरण है, वह गुण सहज साध्य हो जाता है एवं धीरे-धीरे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’की अर्थात सम्पूर्ण विश्व ही मेरा घर है, यह भावना आत्मसात होने लगती है […]
८ मईसे ‘जागृत भव’ गुटकी एक युवा सदस्या सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेकी प्रक्रिया कर रही हैं, वैसे वह गत दो वर्षमें धर्मधारा सत्संग सुन रही हैंं……
आश्रममें हमारी प्रवृत्ति अनुरूप भिन्न योगमार्गसे साधना करना है सम्भव : आश्रममें रहकर हम हमारी प्रवृत्ति अनुरूप योग्य मार्गदर्शनमें विशिष्ट योगमार्गसे साधना कर सकते हैं, जबकि घरपर रहकर हम मात्र भक्तियोग, ध्यानयोग एवं धर्मप्रसारकी सेवा या अन्य कोई एक विशेष सेवा कर सकते हैं; किन्तु आश्रममें शीघ्र आध्यात्मिक प्रगतिहेतु पोषक साधना मार्ग एवं सेवा दोनों […]
वृत्तिको अन्तर्मुखी करनेहेतु एवं स्वयंमें साधकत्व निर्माण करनेहेतु आश्रममें कुछ दिवस रहना आवश्यक : घरमें एक समान्य गृहस्थ अपने मनानुसार आचरणकर, घरके अन्य सदस्योंको अपने वर्तनसे कष्ट देता है; किन्तु आश्रममें रहनेपर इस प्रकारकी चूकोंका भान कराया जाता है, जिससे दोष एवं अहंके लक्षणोंको दूर करनेहेतु सहायता मिलती है और वृत्ति अन्तर्मुखी होती है । […]
जो सात्त्विक और धर्माचरणी होते हैं, उनके लिए सूक्ष्म इन्द्रियोंकी प्रक्रियाको जागृत करना बहुत सरल होता है; क्योंकि उनके ऊपर मुख्यत: अहम् एवं थोडे प्रमाणमें पितृ-दोष और समष्टि स्तरपर कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियोंका आवरण होता है….
आश्रममें सन्तोंकी स्थूल एवं सूक्ष्म उपस्थितिके कारण वहांके चैतन्यसे वहां रहनेवाले साधक-जीवोंके चारों देहकी (श्त्तोल देह, मनोदेह (मन) कारणदेह (बुद्धि) एवं महाकारण देहकी (अहंकी) शुद्धि होती है…
आश्रममें इन्द्रिय निग्रह सिखाया जाता है, जो सुखी जीवनकी होती है कुञ्जी : आश्रम कितना भी बडा हो, वहां घर समान कलह-क्लेश नहीं होता; सभी, अपनी इन्द्रियोंका निग्रह कैसे कर सकते हैं ?, यह सिखाया जाता है….