जनवरी २०११ में चेन्नईमें एक दंपतिसे भेंट हुई । दोनोंको हमारी संस्थाका उद्देश्य अच्छा लगा और वे हमसे जुड गए। प्रत्यक्षमें दोनोंका मेरे प्रति भाव अच्छा था ।मैंने चार दिन उनके घरमें रहनेके पश्चात उनका सूक्ष्म परीक्षणकर अध्यात्मिक स्तर निकाला तो पता चला कि पतिका आध्यात्मिक स्तर ५६% था और पत्नी का ४०% | मुझे […]
यदि हम अपने प्रत्येक कृत्यको ईश्वरको साक्षी मानकर, उन्हें स्मरण करके एवं उन्हें जैसा अपेक्षित है, वैसा करते हैं तो उसीको भाव कहते हैं और साधनामें इसका अत्यधिक महत्त्व है; अतः अपनी दिनचर्याकी प्रत्येक कृतिमें ईश्वरकी अनुभूति कैसे ले सकते हैं ?, यह चरण-दर-चरण हम सीखेंगें और इससे हमारे जीवनको एक नूतन दिशा ही नहीं […]
एक भक्तका जीवन एक ईश्वरीय अनुष्ठान होता है । उसका प्रत्येक कर्म ईश्वरकी आराधना है । तो आइए, हमारा जीवन ऐसा कैसे बनें ?, इस हेतु हम अपने प्रत्येक कर्मको भावपूर्वक करनेका प्रयास करेंगे और इस सम्बन्धमें हम दिनचर्या सम्बन्धी, छोटे-छोटे, किन्तु महत्वपूर्ण तथ्योंको बुद्धिसे समझेंगे और उसके पश्चात उसे जीवनमें उतारेंगें । विश्वास करें, […]
हमारे मनीषियोंने कहा है कि मनुष्यमें तमोगुणका प्रमाण अधिक होनेके कारण मद्यपान या मांसभक्षण करनेकी प्रवृति होना यह सामान्य सी बात है; किन्तु जो आत्मकल्याण चाहते हैं अर्थात अध्यात्मके पथपर प्रगति करना चाहते हैं…..
अधिकतर युवा साधकोंको साधना करते देख कुछ अल्पज्ञानी उन्हें दिशाभ्रमित करते हैं कि अभी आपकी आयु ही क्या हुई है ?, अभीसे यह सब करनेकी क्या आवश्यकता है ? साधना तो बुढापेमें सर्व उत्तरदायित्वसे मुक्त होकर करनी……
भक्तियोग अंतर्गत नामसंकीर्तनयोगका मार्ग अनुसरण करनेसे जब नामजप अखण्ड हो जाता है, तब जागृतावस्थामें ही ध्यान साध्य हो जाता है ।
जब नामजप अखंड……
कलियुगमें अन्य योगमार्गके योग्य गुरु मिलना कठिन है और भक्तियोगके गुरु मिलना सरल है; अतः कलियुगमें भक्तियोगका योगमार्ग अधिक योग्य है । कलियुगमें अधिकांश सन्तोंने भक्तिमार्गका ही प्रसार किया है ! कुछ सन्त यदि…….
कलियुगमें धर्मका ह्रास हो जानेके कारण साधकत्वमें कमी आ गई है, फलस्वरूप साधनाके लिए समय निकालना कठिन है, ऐसेमें उठते-बैठते ईश्वरका नामसंकीर्तन करना अधिक सरल साधना है । व्यक्तिपर कलिका प्रभाव…..
दोष : अनुशासनहीनता अन्तर्गत आलस्यके कारण कार्यपद्धतिका पालन न करना यदि हम इस तथ्यका विवेचन करें कि किसी व्यक्तिसे कार्यपद्धतिका पालन क्यों नहीं होता है तो उसमें प्रथम दोष आलस्यका आता है । वैज्ञानिक सुख-सुविधाओंने आजके मानवको शारीरिक रूपसे आलसी बना दिया है और आज शारीरिक और मानसिक रोगोंमें वृद्धिका एक मुख्य कारण यह भी […]
दोष : अनुशासनहीनता अन्तर्गत कार्यपद्धतिके पालन करनेका अभाव प्रत्येक प्रतिष्ठान या कार्यालयकी अपनी कार्यपद्धति होती है, उसे, सम्पूर्ण व्यवस्था सुचारू रूपसे चले, इस हेतु बनाया जाता है । भारतमें बाल्यकालसे अनुशासनबद्ध होना नहीं सिखाया जाता है; अतः आज सर्व सामान्य व्यक्तिमें अनुशासनहीनताका प्रमाण बहुत अधिक है । आपको यदि मेरी बातपर विश्वास न हो तो […]