यह सम्पूर्ण सृष्टि कर्मफलके सिद्धान्तद्वारा संचालित होती हैं ! जिन पापियोंको यह लगता है कि इस जगतके न्याय प्रणालीसे वह बचकर अपने पापके फल भोगनेसे मुक्त हो जाएगा, उसे मृत्यु उपरान्त और भी अधिक कठोर दण्ड दिया जाता है और उसका कुल, उसके कर्मोंका आंशिक फल भोगता है और अपने पापकर्मके ब्याज, वह अगले जन्मोंमें […]
दुर्लभम् त्रैमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकं । मनुष्यत्वम् मुमुक्षत्वम् महापुरुषसंश्रय ।। – विवेकचूडामणि
आद्यगुरु शंकराचार्यके अनुसार तीन बातोंका एक साथ होना दुर्लभ है और यह मात्र देवकृपासे साध्य हो सकता है –
१. मनुष्यकी योनि
२. मुमुक्षुत्व
३. सन्तका सान्निध्य, मार्गदर्शन एवं कृपा मिलना………
पूर्व जन्म या इस जन्मके ध्यानमार्गी या ज्ञानमार्गीकी बुद्धि और स्मरण शक्ति सात्त्विक और तीक्ष्ण होती है किन्तु जैसे-जैसे साधनाका स्तर अस्सी प्रतिशतसे आगे जाने लगता है, साधनाकी प्रगल्भता बढती है साधकका बुद्धि एवं मनका लय होने लगता है फलस्वरूप साधकका विश्वमन और विश्व बुद्धिसे सहज एकरूपता बढने लगती है ऐसेमें साधकका (संतका कहना अधिक […]
भगवानसे प्रेम इन छ: भावोंकेद्वारा किया जा सकता है:- १. मैया यशोदाके समान (वात्सल्य भावसे) २. अर्जुनके समान (साख्य भावसे) ३. गोपियोंके समान (माधुर्य भावसे) ४. अक्रूरके समान (दास्य भावसे) ५. उद्धवके समान (ज्ञान भावसे) ६. सुदामाके समान (शान्त भावसे) जब कोई मनुष्य इन छ: भावोंमेंसे किसी भी एक भावमें पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वाससे शरणागत […]
ग्रन्थोंका अभ्यास करना तभी परिणामकारक होता है जब उनमें बताए सुग्राह्य तथ्योंको हम आचरणमें लानेका प्रयास करते हैं -तनुजा ठाकुर
जब भी किसी संतके आश्रममें जाएं और आपको कोई सेवाकी संधि मिली तो इस प्रकार प्रार्थना करें ” हे परम पूज्य गुरुदेव, मुझे आपकी कृपासे यह सेवाकी संधि मिली है, मेरी यह सेवा चूक विरहित, भावपूर्ण, एकाग्रतापूर्वक और परिणामकारक (output oriented) हो ऐसा आप कृपा करें, सेवाके मध्य चूक होते समय ही हमें चूकका भान […]
जब तक ईश्वरको हम अपना सर्वस्व नहीं अर्पण करते हैं , ईश्वर भी हमें अपना सर्वस्व नहीं देते ! – तनुजा ठाकुर
मन और बुद्धिमें बुद्धि अधिक सूक्ष्म होती है अतः हमारा वर्तन मनके अनुसार नहीं बुद्धिके अनुसार होना चाहिए | मन हमें हमारे संस्कारोंके अनुसार वर्तन करनेको कहता है और बुद्धि उचित और अनुचित का निर्णय लेने में सक्षम होती है अतः बुद्धिके स्तरपर लिया गया निर्णय अधिक योग्य होता है। एक उदहारणसे समझ लेते हैं […]
अनेक भक्त जब किसी संत या अपने ज्येष्ठ साधकको कुछ वस्तु अर्पण करते हैं तो उन्हें यह अपेक्षा होती है कि वे उसे स्वयं उपयोग करे। हम अर्पण क्यों करते हैं ? अर्पण करनेसे उस वस्तुके प्रति हमारी आसक्ति नष्ट हो, इस हेतुसे हम कुछ अर्पण करते हैं । जब हमने किसीको कुछ अर्पण किया […]
१. मेरे श्रीगुरुने मुझे जो भी शब्दजन्य एवं शब्दातीत ज्ञान दिया है, उसके लिए उन्होंंने कभी एक पैसा भी नहीं मांगा, तो मैं कैसे लूं ? २. अध्यात्मका खरा ज्ञान देनेवाले कभी पैसेकी मांग नहीं करते, उनकी झोलीमें जो स्वेच्छासे दे दें, उसे वे स्वीकार कर लेते हैं ! ३. अध्यात्मकी सीख पैसेसे नहीं मिल […]