नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥ – महाभारत अर्थ : विद्याके समान श्रेष्ठ नेत्र नहीं , सत्यके समान श्रेष्ठ तप, आसक्तिके समान बडा दुःख एवं त्यागके समान श्रेष्ठ सुख नहीं है ।
न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति । अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान् ॥ अर्थ : कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है; इसलिए कलके करने योग्य कार्यको आज कर लेनेवाला ही बुद्धिमान है ॥
उद्यमेनैव हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै । न हि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविशन्ति मृगाः ॥ अर्थ : प्रयत्न करनेसे ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करनेसे नहीं, सोते हुए सिंहके मुखमें मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं ।
नारिकेलसमाकारा दृश्यन्तेऽपि हि सज्जनाः । अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥ अर्थ : सज्जन व्यक्ति नारियलके समान होते हैं ऊपरसे कठोर एवं भीतरसे कोमल, अन्य तो बदरीके फलके समान केवल बाहरसे ही सुन्दर लगते हैं ।
चिता चिंता समाप्रोक्ता बिंदुमात्रं विशेषता । सजीवं दहते चिंता निर्जीवं दहते चिता॥ अर्थ : चिता और चिंता समान कही गयी हैं; परन्तु चिंतामें प्रयुक्त बिन्दुकी एक विशेषता होती है, चिता मृतको जलाता है और चिंता जीवितको।
महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः। पद्मपत्रस्थितं तोयम् धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥ अर्थ : महापुरुषोंका संग किसके लिए लाभदायक नहीं होता,कमलके पत्तेपर पडी हुई जलका बूंद मोती जैसी शोभा प्राप्त कर लेता है ।
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः ।। तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ।। अर्थ : मनुष्यको जो प्राप्त होना होता है, उसका उल्लंघन करनेमें देवता भी समर्थ नहीं हैं; इसलिए मुझे न आश्चर्य है और न शोक; क्योंकि जो मेरा है वह कोई और नहीं ले सकता।
कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा॥ अर्थ : फूलोंके समान मनीषियोंकी दो ही गतियां होती हैं; वे या तो समस्त विश्वके सिरपर सुशोभित होते हैं या वनमें अकेले बिना किसीके जानकरीके स्वयंको विलीन कर देते हैं।
जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवनं खलु देहिनाम् । तथाविधिमिति त्वाशाश्वत्कल्याणमाचरेत् ।। अर्थ : जिस प्रकार चन्द्रका प्रतिबिम्ब अस्थिर होता है उसी प्रकार मनुष्यका जीवन भी अनिश्चित और अस्थिर होता है। विधिके इस विधानको जानते हुए मनुष्यको ऐसे कार्य करते रहना चाहिए जिससे स्वयंका एवं समाजका शाश्वत कल्याण हो।
स्वाध्याय तथा पूजासे ऋषियोंका सत्कार, शास्त्र अनुसार यज्ञ कर देवताओंकी पूजा, श्राद्धसे पितरोंकी पूजा, अन्न देकर अतिथियोंकी और बलिकर्मसे सम्पूर्ण भूतोंकी पूजा (संतुष्टि) करनी चाहिए….