शास्त्र वचन

त्यागी व्यक्तिका महत्त्व


शतेषु जायते शूर: सहस्त्रेषु च पंडित: । वक्ता दशसहस्त्रेषु दाता भवति वा न वा ।।                अर्थ : एक शतक व्यक्तिमें कोई एक वीर होता है एक सहस्रमें कोई एक विद्वान होता है, दस सहस्रमें कोई एक वक्ता होता है; परंतु त्यागी व्यक्ति वह अत्यंत विरला ही होता है […]

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समान प्रकृतिवालोंसे मित्रताका सहज होना


मॄगा: मॄगै: संगमुपव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरंगास्तुरंगै:। मूर्खाश्च मूर्खै: सुधय: सुधीभि: समानशीलव्यसनेषु सख्यं।। अर्थ : मृग, मृगके साथ रहते हैं, गौ, गौके साथ रहती हैं और घोडा, घोडेके साथ ! मूर्खको मूर्खोंकी संगत मिल जाती है और विद्वान, विद्वानके साथ मित्रता करते हैं, समान स्वभाव और समान व्यसनवालोंमें स्वतः ही मित्रता हो जाती है |

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शास्त्रज्ञ खरे ज्ञानी हो यह आवश्यक नहीं !


यथा खर: चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य। एवं हि शास्त्राणि बहुनि अधीत्य अर्थेषु मूढा: खरवद् वहन्ति।। अर्थ : जिस प्रकार गधेको चन्दनकी लकडियोंको ढोते समय उसे भान नहीं होता कि अति मूल्यवान एवं सुगंधित लकडी उसके पीठपर है, उसी प्रकार शास्त्रज्ञोंको शास्त्रोंका खरा अर्थ समझमें नहीं आता वे भी खरके समान शास्त्रके ज्ञानका अहं […]

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नामकी महिमा


नाम जीहं जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा ॥1॥ – रामचरितमानस
इस चौपाईमें संत तुलसीदासने भगवान् श्रीरामके नामकी महिमा बताई है  …..

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धर्म ही मनुष्यता प्रदान करता है !


आहारनिद्राभयमैथुनञ्च समानमेतत् पशुभिर्नराणाम्। धर्मोहि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हिनाः पशुभिस्समानाः ।। – चाणक्य नीति अर्थ : आहार, निंद्रा, भय और मैथुन,  ये मनुष्य और पशुमें समान होते हैं। मात्र धर्म ही मनुष्यको भिन्न अभिज्ञान(पहचान) देता है; अतः धर्म-विमुख जीव पशु समान है।

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कर्मफल


पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः । न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः ।। – महाभारत अर्थ : जीवको सत्कर्मोंका फल अच्छा लगता है, किन्तु सत्कर्म नहीं।  उन्हें दुष्कर्मोंका फल अच्छा नहीं लगता; किन्तु वे यत्नपूर्वक दुष्कर्म करते हैं।

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आनन्दी रहने हेतु वर्तमानमें रहना एक सरल उपाय


जो समय बीत चुका है उसके विषयमें विचार करना व्यर्थ है एवं जो भविष्यमें घटित होनेवाला है उसके सम्बन्धमें भी सोचना बहुमूल्य समयको व्यर्थ करना है । मन अनावश्यक तथ्योंमें रममाण न हो इस हेतु मनमें विचारोंके आवेगको नियन्त्रित करने हेतु नामजप करना चाहिए । सूक्ष्म विचारोंको नियन्त्रित करने हेतु कोई सूक्ष्म माध्यम ही चाहिए […]

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मांसाहारसे सम्बन्धित सर्व कृतियोंका पापकर्म होना


मांसाहार करनेवाले एवं इस सम्बन्धमें लिप्त प्रत्येक व्यक्ति किसप्रकार पापके अधिकारी बनते हैं इस सम्बन्धमें मनुस्मृतिका यह श्लोक उल्लेखनीय है – अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ।। – मनुस्मृति                                              […]

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जो धर्म दूसरेका बाधक होता है, वह धर्म नहीं, कुधर्म है !


पिछले तीन सहस्र वर्षोंमें ऐसे अनेक कलियुगी धर्मोंका (जिन्हें पन्थ कहना अधिक उचित होगा) जन्म और प्रचार-प्रसार, मात्र सनातन धर्मको नष्ट करने या उसका विरोध करने हेतु ही हुआ है । ये सभी अपने जन्मके समयसे ही प्रत्यक्ष या परोक्षरूपसे सनातन धर्मपर सदैव आघात करते रहे हैं । वेदों एवं अन्य वैदिक धर्मग्रन्थोंकी एवं ईश्वरके […]

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साधनाकी सर्वोच्च स्थिति हेतु लगनसे अभ्यास आवश्यक


पक्वम् मनो ब्रह्मणि लीयते यदा  तदा समाधि: स विकल्पवर्जित:  स्वतोsद्वयानन्दरसानु भावक:  – विवेकचूडामणि (३६३) अर्थ : जिस समय रात्रि –दिवसके निरंतर अभ्याससे परिपक्व होकर मन  ब्रह्ममें लीन हो जाता है उस समय अद्वितीय ब्रह्मान्दरसका अनुभव करनेवाली वह निर्विकल्प समाधि स्वयं ही सिद्ध हो जाती है । भावार्थ : निर्विकल्प समाधि साध्य करना यह प्रत्येक वेदान्तमार्गी […]

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