शास्त्र वचन

अनासक्त होनेपर सुख-दुःखकी अनुभूति नहीं होती


सुख और दु:खकी अनुभूति विषयोंमें आसक्तिके कारण होती है, जो साधनाकर अपने षड्रिपुओंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं उनका मन चाहे संसारकी माया रूपी बगियामें हो या पर्वतकी कन्दराओंमें, वह स्थिर ही रहता है । यथार्थमें माया बुरी नहीं है, मायासे आसक्ति बुरी होती है; अतः आसक्ति नष्ट हो जानेपर मायाके प्रलोभन मनको अस्थिर नहीं […]

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अधर्मसे अर्जित धन दुःखका बनता है कारण


आजकल अनेक लोग येन-केन प्रकारेण धनका संचय करते हैं, उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करनेसे वे अपनी भावी पीढीके लिए सुख-शान्तिकी निश्चिती कर रहे हैं; किन्तु ऐसा है नहीं । ऐसे व्यक्ति अपने लिए पापकर्म निर्माणकर अपना इस लोकमें एवं परलोकमें अहित कर रहे होते हैं । अधर्मसे संचित धन अस्थाई होता है, उससे […]

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मात्र त्यागी पुरुष ही वैदिक संस्कृतिके होते हैं आदर्श


हमारी वैदिक संस्कृति भोगवादी नहीं है, वरन यह त्यागकी प्रवृत्तिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करती है । इसका यह अर्थ कदापि न समझें कि हमारे यहां ऐश्वर्य, समृद्धि, सुख-सुविधा या वैज्ञानिक आविष्कार नहीं थे । प्राचीन भारतीय संस्कृतिके बुद्धिजीवी उच्च कोटिके शोधकर्ता थे एवं उन्होंने भोग और योगमें सुन्दर सामंजस्यके सिद्धान्त प्रतिपादित किए थे, हमारे प्राचीन ज्ञान […]

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अनन्त इच्छाओं एवं वासनाओंका निग्रह मात्र साधनाद्वारा सम्भव


इच्छाएं एवं वासनाएं अनन्त होती हैं, कोई भी मनुष्य एक जीवन कालमें तो क्या, अनेक जन्म लेकर भी उनकी तृप्तिकर, उनसे मुक्त नहीं हो सकता, इसलिए आद्य गुरु शंकराचार्य कहते हैं – अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं  दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥१५॥अर्थात शरीर झुक गया है, सिरके केश श्वेत हो […]

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भगवान शिव और भगवान श्रीविष्णु


ईश्वरके तत्त्वोंको न जाननेके कारण ही कुछ शिवोपासक भगवान विष्णुकी निंदा करते हैं और कुछ वैष्णव भगवान शिवकी निंदा करते हैं, कोई यदि निंदा और द्वेष नहीं भी करते हैं तो उदासीन तो रहते ही हैं; परन्तु शास्त्र कहता है कि  जो व्यक्ति इस प्रकार का व्यवहार करता है उसे वस्तुतः ज्ञानरहित ही समझा जाना […]

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सगुण –निर्गुण नहीं भेदाभेद


कलियुगमें ईश्वरके निराकार स्वरुपको माननेवाले अनेक पन्थोंका जन्म हुआ, वैसे तो निराकार स्वरुपकी आराधना वैदिक धर्मसे सदैवसे ही होती आ रही है, वस्तुत: सत्ययुगमें समाजकी सात्त्विकता अधिक होनेके कारण एवं धर्मके चारों पाद विद्यमान होनेके कारण निराकार स्वरुपकी ही आराधना की जाती थी । जैसे-जैसे युगोंका प्रवाह हुआ एवं धर्मके भिन्न चरणोंके क्षरण हुए वैसे-वैसे […]

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भोजनको प्रसाद मानकर कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करें !


आजकल अनेक व्यक्ति भोजनको जूठा छोड देते हैं, वह एक प्रकारसे ब्रह्मरूपी अन्नका तिरस्कार करना है । भोजनमें मीनमेख निकालनेसे भी भोजनकी अवमानना होती है, जो प्राप्त हुआ है, उसे कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करनेसे सभी देहोंका पोषण होता है । भोजन, इस शरीरको स्वस्थ रखनेका एक माध्यम है और शरीर मोक्षप्राप्ति एवं समाज कल्याणका माध्यम […]

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सन्तोंके चैतन्यसे है पृथ्वी टिकी हुई


सन्त कबीरने कहा है कि ‘परमारथके कारने साधून धरा शरीर’, यथार्थमें सन्त शरीर धारण ही करते हैं जीवोंके उद्धार हेतु, वे दूसरोंके दुःखसे दु:खी एवं दूसरोंके सुखसे सुखी हो जाते हैं । दूसरोंके सुख ही उनके जीवनका उद्देश्य होता है; वे ही हमारे खरे आदर्श होते हैं । वे परहित हेतु अनेक प्रकारके दुःख सहन […]

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जननी और जन्मभूमि है स्वर्गसे भी महान


जननी और जन्मभूमि है स्वर्गसे भी महान आज अनेक हिन्दू मात्र क्षणिक सुखप्राप्ति हेतु मलेच्छोंके देशके बाहरी ऐश्वर्यसे आकर्षित होकर, भारत जैसे आध्यात्मिक देशका परित्याग कर देते हैं । विदेशमें न तो आध्यात्मिक दृष्टिसे पोषण होता है और न ही लौकिक दृष्टिसे कुल, गोत्र, प्रवरकी कोई परम्परा रह पाती है अर्थात वहां स्थायी निवास करनेपर […]

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ब्राह्मण भोजनके औचित्यपर प्रश्न उठानेवाले इसे अवश्य पढें


स्वतन्त्रता पश्चात् यदि वैदिक धर्मशास्त्रोंके अभ्यासको शिक्षण प्रणालीमें अन्तर्भूत किया जाता तो आज अनेक जन्म हिन्दू जो ब्राह्मण भोजनके औचित्यपर प्रश्नचिन्ह उठाते हैं वे ऐसा नहीं करते । मनुस्मृतिके तृतीय अध्यायमें ब्राह्मण भोजनका महत्त्व बताते हुए मनु महाराज कहते हैं – यद्यद्ददाति विधिवत्सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । तत्तत्पितॄणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ।।                  […]

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