निरक्षर यदि कहे कि ‘सभी भाषाओंके अक्षर समान ही होते हैं’, तो जिस प्रकार यह उसका अज्ञान दर्शाता है, उसी प्रकार ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहनेवाले भी अपना अज्ञान दर्शाते हैं । ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहना ‘सभी औषधियां, सभी कानून समान ही हैं’, ऐसा कहनेके बराबर है ।
कहां ‘यह विश्व ही मेरा घर है’, ऐसा भाव रखनेवाले सन्त और कहां बांग्लादेशके ही नहीं, अपितु भारतके हिन्दू भी अपने न लगनेवाले स्वतन्त्रता पश्चातके अब तकके शासनकर्ता !
‘भारतकी स्वतन्त्रता हेतु लडनेवाले युवा क्रान्तिकारियोंको सम्मोहितकर उन्हें कृति करने हेतु विवश किया गया’, ऐसा बुद्धिप्रामाण्यवादियोंने कल कहा तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए !
हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाका कार्य करते समय ‘मैं करता हूं’, ऐसा अहं रखनेकी आवश्यकता नहीं; क्योंकि कालमहिमानुसार यह कार्य होनेवाला ही है; परन्तु इस कार्यमें जो निःस्वार्थ रूपसे तन-मन-धनका त्याग कर सम्मिलित होंगे, उनकी साधना होगी और वे जन्म-मृत्युके फेरेसे मुक्त हो जाएंगे । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
‘हमारा पुत्र विदेशमें कार्यरत है’, ऐसा गर्वसे कहनेवाले माता-पिताओ, यह समझ लो ! ‘हमारा पुत्र विदेशमें कार्यरत है’, ऐसा गर्वसे कहनेवाले माता-पिताओंको ऐसा कहनेमें लज्जा आनी चाहिए; क्योंकि विदेशमें रहनेके कारण, वह अधिकाधिक मायामें आसक्त होता है । वह भारतमें होता तो उसमें ईश्वरप्राप्तिकी ओर अग्रसर होनेकी कुछ तो सम्भावना रहती । – परात्पर गुरु […]
वनस्पति, प्राणी, मानव इत्यादिमें साम्यवाद नहीं । इतना ही नहीं, पृथ्वीपर ७०० कोटिसे अधिक मानवोंमें किन्हीं दोके धन, शिक्षण, शरीर, मन, बुद्धि तथा चित्तमें भी समानता नहीं ।
पाश्चात्य एवं भारतीय संगीत तथा नृत्य : पश्चिमी देशोंमें गायन एवं नृत्य मात्र सुख प्राप्तिके लिए किए जाते हैं । इसके विपरीत भारतमें संगीत एवं नृत्य साधनाके प्रकारके रूपमें ६४ कलाओंमें सम्मिलित थे । इसलिए संगीत एवं नृत्य साधनामें ध्यानकी भांति स्थिर बैठे बिना भी, गाते समय और नृत्य करते समय भी ध्यान लगता है […]
छोटे बालक क्रीडा करते हुए आपसमें लडते हैं, वयस्क मानव ऐहिक विषयोंपर तथा राजनेता सत्ताके लिए लडते हैं । छोटे बालक बडे होनेपर क्रीडाके सम्बन्धमें नहीं लडते, कारण उन्हें वह महत्वपूर्ण नहीं लगता । उसीप्रकार साधनामें प्रगति होनेपर सत्ता तो क्या, किसी भी वस्तुके लिए साधक नहीं लडते, कारण उन्हें मायाकी कोई भी वस्तु महत्वपूर्ण […]
धर्मद्रोही देशद्रोही है; क्योंकि धर्मके कारण ही देशमें सामर्थ्य आता है । इसका उदाहरण है, विश्वके सभी देशोंको चिंता करनेके लिए बाध्य करनेवाले इस्लामी देश । इसके विपरीत, धर्मद्रोहियोंके कारण देश दुर्बल होता है, इसका उदाहरण है, भारत ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
कोई भी रोग होनेपर रोगीको आशा होती है, कि वह ठीक हो जाएगा । केवल बुढापा या वार्धक्य एक ऐसा रोग है, जो कभी ठीक नहीं होता ।