श्रीगुरु उवाच

हिन्दुओ, धर्ममें बताए चार वर्णोंका महत्त्व ध्यानमें रखें


हिन्दू धर्ममें चार वर्ण हैं । उसपर आलोचना करनेवाले बुद्धिप्रमाण्यवादियोंको तथा अन्य धर्मियोंको यह ज्ञात नहीं होता है कि सर्व क्षेत्रोंमें ऐसा ही है, उदा. आधुनिक चिकित्सकोंमें बालरोग विशेषज्ञ, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, नेत्रचिकित्सक, हृदयरोग विशेषज्ञ, मनोरोग विशेषज्ञ, जैसे अनेक प्रकार हैं, उसीप्रकार साधनामें आयु, स्त्री-पुरुष, वर्ण इत्यादिनुसार भेद हैं । साधनाके सन्दर्भमें इतने भेद होना हिन्दू […]

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श्रीगुरु उवाच


हिन्दू धर्मपरिवर्तन ईश्वरप्राप्ति हेतु नहीं करते हैं अपितु वे आर्थिक सुख-सुविधाओंकी प्राप्ति हेतु करते हैं । ऐसे लोगोंका हिन्दुधर्ममें न होना ही उचित है ।

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हिमालय पर्वतपर हिम (बर्फ) होता है, ऐसा किसीने कहा तो, ‘अनिस’वाले (अन्धश्रद्धा निर्मूलनवाले) कहेंगे, “हमारे गांवके पर्वतपर हिम दिखाओ, तभी मानेंगे !” इस दृष्टिके कारण ही अर्थात स्वयं अन्धे होनेसे वे ईश्वर तथा अनिष्ट शक्तियोंका अस्तित्व नहीं मानते  ।  – परात्पर गुरु डॉ. जयंत अठावले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात

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भूखेको अन्न दें, निर्धनको धन दें, ऐसा भावनाके स्तरपर करना, यह दुःखी मानवकी वास्तविक सेवा नहीं; क्योंकि इससे उनकी समस्याओंका कारण दूर नहीं होता । उनकी दु:खोंका मुख्य कारण है, प्रारब्ध ! वह मात्र साधनासे ही दूर किया जा सकता है ।

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जिन्हें गुरुमन्त्र मिला हो, वे ध्यान दें !    ‘गुरुमन्त्र मिल गया है; अतः प्रगति हो गई’, ऐसा अनेक व्यक्ति सोचते हैं । उनके ध्यानमें यह नहीं आता कि गुरुमन्त्रके साथ गुरुने तन-मन-धन, इनका त्याग करनेके लिए कहा होता है । वह न करते हुए केवल गुरुमन्त्र, वह भी भावपूर्ण, एकाग्रतासे घण्टों न कर, थोडा […]

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ईश्वर संतोंके रूपमें अनुभूति देते है; परन्तु श्रेय संतोंको प्राप्त होता है । अनेक बार ईश्वर, संतोंको, उनके रूपमें दी हुई अनुभूति बतलाते हैं ।

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वैज्ञानिक अनेक वर्ष शोध करके कोई संशोधन करते हैं । कुछ वर्ष उपरान्त उस सन्दर्भमें नवीन संशोधन होता है तथा पूर्वके संशोधनको दुर्लक्ष्य किया जाता है । इसके विपरीत अध्यात्ममें संशोधन नहीं करना पडता । ईश्वरसे योग्य ज्ञान अपने आप प्राप्त होता है तथा वह चिरन्तन सत्य होनेसे उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता । इससे ज्ञात […]

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श्रीगुरु उवाच


‘पुनः पुनः जन्म न हो’ या ‘भक्ति करनेके लिए अनेक जन्म मिले’, ऐसा लगना, स्वेच्छा है । इसका अगला चरण है, ‘सब ईश्वरकी इच्छानुसार हो ’, ऐसा लगना !

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श्रीगुरु उवाच


कहां वैज्ञानिक और कहां ऋषि-मुनि !  कहां अन्य ग्रहपर जानेवाले यान खोजनेपर विज्ञानकी प्रशंसा करनेवाले बुद्धिवादी, तो कहां सूक्ष्म देहसे विश्‍वमें ही नहीं तो सप्तलोक और सप्तपातालमें भी आधे पलमें सूक्ष्मसे जानेवाले ऋषि-मुनि !

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‘बुद्धिवादियोंमें यह अहंकार होता है कि ‘मुझे सब पता है’; इसलिए उन्हें किसी भी विषयका पूर्ण ज्ञान नहीं होता’, इसके विपरीत संतोंमें अहंकार नहीं होता, इसलिए उन्हें ‘शब्दातीत अनेक विषयोंका ज्ञान होता है ।’ – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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