श्रीगुरु उवाच

श्रीगुरु उवाच


‘यज्ञमें आहुति देने हेतु तथा अन्य धार्मिक कार्यों हेतु धन व्यय करनेकी अपेक्षा वह निर्धनोंको दें’, ऐसा जब बुद्धिप्रामाण्यवादी कहते हैं तब उनकी बुद्धिपर तरस आता है; कारण उन्हें अध्यात्मशास्त्र ज्ञात नहीं होता, तब भी वे ऐसी अनर्गल बातें करते हैं । यदि वे अध्यात्मशास्त्रके अनुसार निम्नलिखित सूत्र ध्यानमें रखेंगे, तो उनकेद्वारा ऐसे धर्मद्रोही विधान […]

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सन्तोंके कार्य करनेकी पद्धति


कुछ सन्त गुरुका आदेश आनेके पश्चात उसीप्रकार कार्य करते हैं, तो कुछ सन्त कार्य सम्बन्धित कोई प्रश्न होनेपर गुरुसे सूक्ष्मसे पूछकर तुरन्त उत्तर प्राप्त करते हैं और उस प्रकार कार्य करते हैं । इससे वे तुरन्त कार्य कर पाते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था

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श्रीगुरु उवाच


विवाहोपरान्त भी मायकेका उपनाम लगाकर हिन्दू संस्कृतिके ‘दूसरेसे एकरूप होने’के मूलभूत सिद्धान्तको नकारना, स्त्रीमुक्ति नहीं ! विवाहके उपरान्त स्त्रियां अपने नामके साथ ससुरालका उपनाम लगाती हैं, यह हिन्दू संस्कृतिकी प्राचीन परम्परा है । आजकल आधुनिक विचारोंसे प्रभावित कुछ महिलाएं स्त्रीमुक्तिके नामपर मायके एवं ससुराल, दोनोंके उपनाम लगाती हैं । ‘स्व’का त्यागकर दूसरेमें विलीन होना, हिन्दू […]

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श्रीगुरु उवाच


राजनेताओंमें देशप्रेम अथवा धर्मप्रेम नहीं होता । वे स्वार्थी होते हैं और उन्हें केवल स्वयंसे ही प्रेम होता है !

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श्रीगुरु उवाच


मन्दिरोंका सरकारीकरण करनेमें सरकारको लज्जा कैसे नहीं आती ? ‘सरकारका एक भी विभाग भ्रष्टाचारमुक्त, सही ढंगसे कार्य करनेवाला है क्या ? सरकारने अपने अधिकारमें लिए मन्दिरोंको कितना लूटा है ! ऐसा होते हुए भी सरकारको मन्दिरोंका सरकारीकरण करनेमें लज्जा कैसे नहीं आती ?’

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श्रीगुरु उवाच


भारतमें अपराधोंकी प्रविष्टि अल्प संख्यामें होनेका कारण है, अनेक लोग पुलिस थानेमें अपराध प्रविष्ट कराने नहीं जाते;  क्योंकि उन्हें ज्ञात होता है कि वहां समय व्यर्थ जाएगा । इतना ही नहीं, कभी-कभी तो पुलिसकी उद्दण्डताके कारण अपमान भी सहन करना होगा और अन्तमें उसकी फलोत्पत्ति शून्य होगी ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, […]

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श्रीगुरू उवाच


मार्गपर कांटे हों तो चलना दूभर होता है, उसीप्रकार स्वभावदोष हों तो, साधनाके पथपर चलना कठिन होता है ।

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श्रीगुरू उवाच


‘रोगका उपचार करनेसे अच्छा है, रोग न हो, इसके लिए उपाय करना ।’ (Prevention is Better Than Cure) ऐसी एक कहावत है । यह केवल कहनेके लिए नहीं है । बडे होनेपर दुर्व्यसन न लगे, इसके लिए बच्चोंपर बचपन में ही सात्त्विक संस्कार डालना आवश्यक है । जब हम उन्हें बचपनमें, ‘कूडा मत करो, झूठ […]

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आपातकालमें साधनाके सन्दर्भमें व्यायामका महत्त्व


‘स्थूलसे सूक्ष्म श्रेष्ठ’ है, यह आध्यात्मका एक सिद्धान्त होनेसे इतने वर्ष मैं साधकोंको स्थूलदेहके व्यायाम करनेको नहीं कहता था । इसके स्थानपर देहसे सूक्ष्म, मन एवं बुद्धिको प्रथम सात्त्विक बनाने और तत्पश्चात उनका लय करने हेतु साधना करनेको कहता था। अब यह ध्यानमें आया कि राष्ट्र एवं धर्मके रक्षणार्थ एवं साधना हेतु स्थूलदेह (शरीर) सक्षम […]

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वास्तविक वास्तुशुद्धि


वास्तविक वास्तु शुद्धि १. सर्वसाधारण व्यक्ति : इन्हें ‘इनके निवासका स्थान ही वास्तु है’, ऐसा लगता है और इस हेतु ये आवश्यक वास्तुशुद्धि विधि करते हैं । २. व्यष्टि साधना करनेवाले : इनके अनुसार, शरीर, मन, बुद्धि ही आत्माका वास्तु होता है और ये उसकी शुद्धिका प्रयत्न करते हैं । ३. समष्टि साधना करनेवाले : […]

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