रोगका लाभ साधनामें प्रगति हेतु लिया जा सकता है । उदाहरणके रूपमें, दांत न होना, भूख न लगना । इससे भोजनके प्रति रुचि-अरुचिसे आगे जानेमें सहायता मिलती है । एक बार किसी एक इन्द्रियपर विजय प्राप्त हुई तो अन्य इन्द्रियोंके सन्दर्भमें भी वैसा ही होकर साधनामें प्रगति हो सकती है । हां, यदि कोई इस […]
प्रत्येक पीढी आनेवाली अपनी अगली पीढीसे समाज, राष्ट्र और धर्मके सन्दर्भमें आशा रखती है । इसके स्थानपर प्रत्येक पीढीको ऐसा विचारकर कार्य करना चाहिए कि हम जो कुछ भी कर सकते हैं, वह सब हमें करना चाहिए, जिससे हमारी अगली पीढीको उसके सन्दर्भमें कुछ करनेकी आवश्यकता शेष न रहनेसे वह पूरा समय साधनाके लिए दे […]
व्यक्तिकी असहाय स्थितिका लाभ उठाकर उसे ‘अपनी सुरक्षा क्रय करें’ ऐसा कहनेवाली पुलिस तथा राज्यकर्ता हिन्दू राष्ट्रमें नहीं होंगे । किसी व्यक्तिको अपना जीवन असुरक्षित लगनेपर, वह व्यक्ति पुलिसके पास जाकर सुरक्षाकी मांग करता है, तब कई प्रकरणोंमें पुलिस सुरक्षा देनेकी मांगको नकारते हैं, (सुरक्षाकी आवश्यकता होनेपर धन देकर सुरक्षा प्रदान करनेका शासनका नियम […]
देवालयोंके उत्सव हों, यात्रा हो अथवा गणेश विसर्जनकी शोभायात्रा, सर्व अवसरोंपर आधुनिक अथवा पाश्चात्य संगीतकी तालपर मद्यपानकर नाचनेवाले हिन्दू दिखाई देते हैं । ऐसे कृत्योंसे वह कार्यक्रम देवताका नहीं; अपितु असुरोंका बन जाता है । अन्य धर्मियोंके किसी धार्मिक कार्यक्रममें इस प्रकारका दृश्य नहीं दिखाई देता । ‘मद्य पीकर नाचना, यह धार्मिक कार्यक्रमका एक भाग […]
भारतमें अन्य कुछ आयात करनेकी अपेक्षा राष्ट्रप्रेमी तथा धर्मप्रेमी नेता आयात करो । उसके पश्चात कुछ भी आयात नहीं करना होगा । भारत पुनः विश्वगुरु होगा एवं अपना प्राचीन वैभव प्राप्त करेगा । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)
हिन्दुओंके स्थानपर मुसलमानोंके पास ‘एकजुट मतपेटी’ होनेके कारण सर्वदलोंके राजनेता उन्हें सन्तुष्ट करनेके प्रयास करते हैं । हज यात्राको अनुदान, सच्चर आयोगकी अनुशंसाका कार्यान्वयन, मदरसोंके लिए विशेष अनुदान, ये सर्व मुसलमानोंके एकजुट मतोंके फलस्वरूप ही हैं । हिन्दुओंकी जाति, दल, सम्प्रदाय, प्रान्त, भाषा, इस प्रकार विभिन्न गुटोंमें बंटवारा होनेके कारण उनके मत भी बंट गए […]
निर्गुण ईश्वरीय तत्त्वसे एकरूप होनेपर ही वास्तविक शान्तिका अनुभव होता है । तथापि शासनकर्ता जनमानसको साधना सिखानेके स्थानपर मात्र सतही मानसिक स्तरके उपाय करते हैं । उदा. जनताकी अडचनोंको दूर करने हेतु सतही स्तरके प्रयत्न करना, जैसे मनोचिकित्सालय स्थापित करना । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन […]
इस आधुनिक विज्ञानके युगमें आजकी पीढीका अध्यात्मपर विश्वास हो और वह अध्यात्मकी ओर अग्रसर हो, इसलिए आध्यात्मिक संशोधन करना पडता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)
फलकी अपेक्षा न करते हुए धर्मयुद्ध करनेसे निष्काम कर्मयोग होता है; फलस्वरूप आध्यात्मिक स्तर बढता है । इसे ही आध्यात्मिक स्तरपर जीतना कहते हैं ।- परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)
देशका विनाश करनेवाला लोकतन्त्र ! चुनावके समय मतप्राप्ति हेतु जनताको लालच देनेवाले अर्थात प्रत्यक्षमें कभी न आनेवाली विविध योजनाओंकी घोषणा करनेवाले तथा पैसोंकी ‘खैरात’ बाटंनेवाले लोकप्रतिनिधियोंके कारण ही देशकी यह दुर्गति हुई है ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)