गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ।। अर्थ : स्वयं भगवान श्री पद्मनाभके श्रीमुखसे गायी(सुनाई ) गयी श्रीमद्भगवद्गीता जैसे दिव्य ग्रंथका अभ्यास करनेके पश्चात क्या और कोई शास्त्र पढनेकी आवश्यकता हो सकती है क्या ?
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सह्स्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ।। अर्थ : भगवान शंकर माता पार्वतीसे कहा , “हे सुमुखी, प्रभु श्रीरामका एक बार नाम लेना विष्णुसह्स्रनामका उच्चारण करने समान है। अतः मैं सदैव मनको लुभाने वाले ‘राम राम’ का ध्यान करता हूं ।”
या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेण संस्थितः ।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थितः ।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरुपेण संस्थितः ।
नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमो नमः । ।
अर्थ : उन देवीको वंदन है जो मातृरूपमें सर्वत्र विद्यमान हैं….
गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्र्यमेव च । आगता सुखसंपत्तिः पुण्याच्च तव दर्शनात् ।। अर्थ : हे प्रभु, आपके दर्शनसे हमारे पूर्व पाप , शोक, दारिद्र्यका नाश हो, सुख-संपत्ति और पुण्यका आगमन हो जाता है, आपको नमन है !
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योम भूमिर्नतेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥
अर्थ : मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूं, न मैं कान, जिह्वा, नाक और नेत्र हूं । ……
कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् । करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ।। अर्थ : हे नारायण ! जो भी मेरे शरीर, मन, वचन, इन्द्रिय, बुद्धि और आत्मासे सोच समझकर या अज्ञानतावश (अपनी प्रकृति अनुरूप) हो रहा है, मैं सर्वस्व आपके श्री चरणोंमें समर्पित करता हूं !
अच्युतं केशवं रामनारायणम् । कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभम् । जानकीनायकं रामचंद्रं भजे ।। अर्थ : अच्युत , केशव , श्रीराम , नारायण , कृष्ण , दामोदर, वासुदेव , श्रीहरि, श्रीधर , माधव, गोपी बल्लभ, जानकीके स्वामी श्रीरामचन्द्र – विष्णुके इन सभी स्वरूपको हम वन्दन करते हैं !
सुरासुरसेवितपादपङ्कजा करे विराजत्कमनीयपुस्तका । विरिञ्चिपत्नी कमलासनस्थिता सरस्वती नृत्यतु वाचि मे सदा ॥ अर्थ : उन मां सरस्वतीको नमन है जिनके चरणकमलकी सेवा देवता और असुर दोनों ही करते हैं, जिनके हस्तमें एक सुन्दर ग्रन्थ है , जो ब्रह्माकी संगिनी है और पद्मपर विराजमान हैं । हे मां, आप मेरी वाणी पर सदैव नृत्य करें (अर्थात् […]
मनोजवं मारुततुल्यवेगम् । जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यम् । श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ।। अर्थ : उन श्री हनुमानके शरणागत हूं जिनका वेग उनके पिता वायु एवं मन समान तेज है, जो जितेंद्रिय है, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, वानर सेनाके प्रमुख है और प्रभु श्रीरामके दूत हैं ।
शिवं शिवकरं शान्तं शिवात्मानं शिवोत्तमम् । शिवमार्ग प्रणेधरम् प्रणतोस्मि सदाशिवम् ।। अर्थ : उस सदाशिवको नम्र वंदन है जो शांत , परम कल्याणकरी ,शिवात्मा स्वरूप है, सभीमें उत्तम है एवं सभी मार्गोंमें श्रेष्ठ हैं !