संत वाणी

सन्त वाणी


जब हवा चले तो पंखा चलाना छोड सकते हैं; परन्तु जब ईश्वरकी कृपादृष्टि हो तो हमे ईश्वरकी भक्ति नही छोडनी चाहिए – स्वामी रामकृष्ण परमहंस

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सन्त वाणी


​मूर्खोंसे वाद-विवाद करके कोई बुद्धिमान नहीं कहला सकता है । मूर्खपर विजय प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय है कि उसकी ओर ध्यान ही न दिया जाए ! – सन्त ज्ञानेश्वर

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सन्त वाणी


यह मोहसे भरा हुआ संसार एक स्वप्नकी भांति है । यह तबतक ही सत्य प्रतीत होता है, जबतक व्यक्ति अज्ञान रूपी निद्रामें सो रहा होता है; परन्तु जागनेपर इसकी कोई सत्ता नहीं रहती है । – आदिगुरु शंकराचार्य

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सन्त वाणी


कुछ लोग भगवानका ध्यान फल और वरदानकी आशासे करते हैं, भक्तिके लिए नहीं ! ऐसे लोग भक्त नहीं; व्यापारी हैं, जो अपने निवेशका चोगुणा मूल्य चाहते हैं । – सन्त कबीरदास

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सन्त वाणी


जिसप्रकार अन्न, लवणके (नमकके) बिना स्वादरहित और फीका लगता है, ठीक उसीप्रकार वाचालकी कही हुई बातें निस्सार होती हैं और लोगोंको रुचिकर नहीं लगतीं ! – सन्त तुकाराम

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सन्त वाणी


जिसप्रकार एक टूटा हुआ ध्वनि-विस्तारक यन्त्र (माइक्रोफोन) सन्देश प्रसारित नहीं कर सकता है, उसीप्रकार एक उद्विग्न मन ईश्वरकी प्रार्थना नहीं कर सकता है ! – परमहंस योगानन्द 

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ईश्वरके अनन्त रंग व रूप


दो व्यक्ति गिरगिटके रंगको लेकर तीखा विवाद कर रहे थे । एकने कहा, “ताडके पेडपर वह गिरगिट सुन्दर लाल रंगका है ।”  दूसरे व्यक्तिने विरोध करते हुए कहा, “आप भूल कर रहे हैं, गिरगिटका रंग लाल नहीं, नीला है ।”  जब वे वाद-विवादसे हल नहीं निकाल पाए….

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परमात्मा मिलनेपर बाहर-भीतर पूर्णतया शान्त होता है


जब तक कोई व्यक्ति ‘अल्लाह हो अल्लाह हो’ का राग ऊंचे स्वरमें आलापता है, तब तक उसे अल्लाह नहीं मिले हैं, यह समझना चाहिए; क्योंकि जिसे अल्लाह मिल जाता है, वह तो शान्त हो जाता है ! – स्वामी राम कृष्ण परमहंस

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सुमिरनकी वृत्ति अंगीकृत करें


सुमिरन सो मान लाइये जैसे पानी मीन । प्राण तजै पल बिछुरै सत्य कबीर कहे दीन ।। – सन्त कबीर अर्थ : सुमिरनकी ऐसी वृत्ति अंगीकृत करें, जैसे मछ्लीका सम्बन्ध जलसे है । मछ्ली जलसे कुछ क्षणोंके लिए वियोग नहीं सह पाती है और अपने प्राण त्याग देती है । यह दीन कबीरकी सत्य वाणी […]

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हमारा अज्ञान ही अन्धकारका कारण


ब्रह्माण्डकी सारी शक्तियां पहलेसे हमारी हैं, वो हम ही हैं, जो अपने नेत्रोंपर हाथ रख लेते हैं, तत्पश्चात रोते हैं कि कितना अन्धकार है ! – स्वामी विवेकानन्द

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