अध्यात्म एवं साधना

ईश्वरका एक गुण है निर्भयता


ईश्वरका एक गुण निडरता है, यदि उस सर्वगुणी ईश्वरसे एकरूप होना है तो इस गुणको तो आत्मसात करना ही होगा और मृत्यु तो अवश्यंभावी है । जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु जिस समय, जिस विधि लिखी होगी, वह होकर रहेगी; अतः इस शाश्वत सत्यसे डरना क्या ?! निडरतासे जीते हुए सत्यके मार्गका अनुसरणकर धर्म-यज्ञमें […]

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परमेश्वरके सगुण और निर्गुण स्वरूपमें नहीं है कोई भेद


परमेश्वरके सगुण और निर्गुण स्वरूपमें कोई भेद नहीं होता; परन्तु एकांगी साधना करनेवाले तथाकथित ज्ञानी इस तथ्यको स्वीकार नहीं करते । सगुण शिवकी आराधना करते-करते हम ‘निर्गुण’ शिवदशाको प्राप्त होते हैं, यह भी एक सत्य है । – तनुजा ठाकुर

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खरे ज्ञानका स्रोत हमारे अन्दर है


खरे ज्ञानका स्रोत बाहर नहीं हमारे अंदर है ! आत्मज्योतिकी प्रकाश ही हमें उस खरे ज्ञानकी स्रोतसे परिचय करवाता है; परंतु कुछ तथाकथित ज्ञानी उस ज्ञानको बाहर ढूंढते है और आत्मसाक्षात्कारकी प्रक्रियाको पानेके लिए योग्य पुरुषार्थ नहीं करते ! – तनुजा ठाकुर

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स्तरानुसार साधनासे सम्बंधित प्रसंग भाग – ४


जनवरी २०११ में चेन्नईमें एक दंपतिसे भेंट हुई | दोनोंको हमारी संस्थाका उद्देश्य अच्छा लगा और वे हमसे जुड गए | प्रत्यक्षमें दोनोंका मेरे प्रति भाव अच्छा  था | मैंने चार दिन उनके घरमें रहनेके पश्चात उनका सूक्ष्म परीक्षणकर अध्यात्मिक स्तर निकाला तो पता चला कि पतिका आध्यात्मिक स्तर ५६% था और पत्नी का ४०% […]

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व्यवस्थित रहनेके लाभ


शारीरिक स्तरकी व्यवस्थितता अर्थात प्रत्येक कृतिको व्यवस्थित करनेसे मानसिक स्तरके व्यवस्थितताके चरणपर हमारा मार्गक्रमण होता है, इससे कुछ काल उपरान्त वैचारिक सुस्पष्टताके चरणको साध्य करना सरल हो जाता है । जो व्यक्ति अव्यवस्थित रहते हैं, उनकी मानसिक प्रक्रियामें भी अस्थिरता, नियोजनबद्धताका अभाव, अनुशासनहीनता, समयबद्धताका अभाव, नियम पालनका अभाव, दूसरोंका विचार न करनेकी वृत्तिका होना, जैसे […]

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नास्तिककी अपेक्षा आस्तिकको उसके पाप कर्मोंका अधिक कठोर दण्ड मिलना


नास्तिककी अपेक्षा आस्तिकको उसके पाप कर्मोंका अधिक कठोर दण्ड देनेका ईश्वर प्रद्त्त विधान है ! नास्तिक तो अपनी अज्ञानतावश ईश्वरके अस्तित्त्वको ही नहीं मानता ! आस्तिक सब जानते हुए पाप कर्म करता है, अतः वह अधिक बडा अपराधी होता है; अतः आस्तिकने बुरे कर्म करनेसे पूर्व उसके फलका अर्थात् ईश्वरद्वारा मिलनेवाले दण्डका विचार अवश्य कर […]

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बाह्य और आंतरिक सत्संग


सत्संगका अर्थ है सतका संग ! सत्संग दो प्रकारके होते हैं,  एक होता है बाह्य सत्संग और दूसरा होता है आतंरिक सत्संग | जब हमारा योग या जुडाव ईश्वरके साथ अखंड हो जाता है और उसका क्रम कभी भी नहीं टूटता है, उसे खरे अर्थोंमें सत्संग कहते हैं और इस प्रकारके सत्संगको आतंरिक सत्संग कहते […]

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चूक लिखना अर्थात् ईश्वरके समक्ष आत्मनिवेदन करना


जो साधक अपने चूक लिखते हैं वे सम्पूर्ण दिवस दससे बारह चूकें लिखनेका प्रयास करें; क्योंकि आपकी चूकोंको पढकर ऐसा नहीं लगना चाहिए है कि आप मात्र चूक लिखने हेतु यह कृति कर रहे हैं अर्थात् यह लिखना एक बंधन है ऐसा नहीं लगना चाहिए, एक सामान्य व्यक्तिसे दिन भरमें २०० चूकें करता है, ऐसेमें […]

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ज्ञानकी पिपासा


ज्ञानकी पिपासा किसे नहीं होती ? १. अहंकारियोंको; क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें अत्यधिक ज्ञान है ! २. पूर्णत्वकी ओर बढ रहे आत्मज्ञानी सन्तको, जिन्हें शब्दजन्य ज्ञान पानेकी रुचि समाप्त हो जाती है; क्योंकि उन्हें शब्दातीत परम शान्तिकी अवस्थामें रहनेमें आनन्द आता है ! – तनुजा ठाकुर  

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भगवान हमें दुःख क्यों देते हैं ?


उत्तर : भगवान हमें दुःख नहीं देते | हमें दुःख हमारे संचित या प्रारब्धमें एकत्रित कर्मफलके कारण  मिलता है या योग्य प्रकारसे धर्माचरण न करनेके कारण ! दुःखका होना एक प्रकारसे वरदान होता है क्योंकि यह हमें अंतर्मुख करता है और जिस प्रकार सोना तपकर कुन्दन बनता है उसी प्रकार दुःख हमें सुखकी अपेक्षा अधिक […]

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