श्रीगुरु उवाच

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उत्पत्ति, स्थिति और लय, इन सिद्धांतोंके अनुसार विविध संप्रदायोंकी स्थापना होती है और कालांतरमें उनका लय होता है, अर्थात वे समाप्त हो जाते हैं । इसके विपरीत, सनातन हिन्दू धर्मकी उत्पत्ति न होने, अर्थात यह अनादि होनेके कारण अनंतकालतक रहेगा । यह हिन्दू धर्मकी विशेषता है । विश्‍वमें दूसरा धर्म ही न होनेके कारण, ‘सर्वधर्मसमभाव’ […]

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भारतमें पुलिस सहित सभी क्षेत्रोंमें अपराधियोंका होना, स्वतन्त्रताप्राप्तिसे अब तकके शासकोंके लिए लज्जाजनक है ! बच्चोंको विद्यालयसे ही साधना सिखाई गई होती, तो बडा होकर कोई अपराधी न बनता । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : https://sanatanprabhat.org/

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कुछ पंथोंके विपरीत, हिन्दू धर्ममें धर्मप्रसारकर केवल स्वधर्मियोंकी अथवा अनुयायियोंकी संख्या बढानेका महत्त्व नहीं है । इसके विपरीत हिन्दू धर्ममें, धर्मकी गहराईमें, सूक्ष्ममें जानेका महत्त्व है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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पूर्वके युगोंमें प्रजा सात्विक होनेसे ऋषियोंको समष्टि प्रसारकार्य करनेकी आवश्यकता नहीं थी । अब कलियुगमें अधिकांश लोगोंके साधना न करनेके कारण सन्तोंको समष्टि प्रसारकार्य करना होता है !’ – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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धर्मके लिए अन्य धर्मी एक हो जाते हैं, जबकि संकीर्ण वृत्तिके हिन्दू केवल जातिके लिए एक होते हैं और अन्य जातियोंके स्वधर्मियोंसे लडते हैं । इसी कारणवश हिन्दू प्रतिदिन मार खाते हैं ! इसपर एकमात्र उपाय है, हिन्दुओंको साधना सिखाकर, उनमें धर्माभिमान जागृत करना !’ – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना होनेके लिए हमें भक्त बनना है आवश्यक !


श्रीराम ईश्‍वरके अवतार थे, पाण्डवोंके समय पूर्णावतार श्रीकृष्ण थे, छत्रपति शिवाजीके समय समर्थ रामदासस्वामी थे । इससे विदित होता है कि ईश्‍वरीय राज्यकी स्थापना ईश्‍वर ही करता है अथवा सन्तोंसे करवाकर लेता है; अतः हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना ईश्‍वर करें या वह सन्तोंसे करवाकर लें, प्रत्येक स्थितिमें हमें उनका भक्त बनना आवश्यक है । – परात्पर […]

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योग्य पात्रको श्रीगुरुसे सब कुछ स्वत: ही हो जाता है प्राप्त


जिसप्रकार पतिव्रता स्त्रीको सत्पुरुष धर्माचरणी पतिद्वारा अर्जित ऐहिक और पारलौकिक थाती स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, उसीप्रकार सद्गुरुकी पूर्ण आध्यात्मिक शक्ति योग्य पात्रतावाले सत् शिष्यको स्वतः ही प्राप्त हो जाती है और तब गुरु शिष्यमें कोई भेद नहीं रह जाता और शिष्य गुरुमय हो जाता है ।

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घरमें माता-पिता न हों, तो बच्चे शोर मचाते हैं; कुछ ऐसी ही स्थिति भारतकी हो गई है, क्योंकि स्वतन्त्रताप्राप्तिके पश्‍चात अब तक इस देशको प्रजापालक शासनकर्ता मिले ही नहीं ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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‘स्वतन्त्रतासे अब तकके ७१ वर्षोंमें नेताआेंद्वारा बच्चोंको विद्यालयमें हिन्दू धर्म न सिखानेसे उन्हें हिन्दू धर्मका महत्त्व ज्ञात नहीं; इसलिए उन्हें हिन्दू धर्मका अभिमान ज्ञात नहीं; इसलिए राममंदिर नहीं बनता । इसके विपरीत मुसलमानोंको धर्माभिमान होनेसे सम्पूर्ण विश्‍वमें उनका वर्चस्व है ।’- परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था

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सहस्रों वर्ष पूर्व ऋषि-मुनियोंद्वारा बताए गए मूलभूत सिद्धान्तोंमें कोई कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकता; क्योंकि उन्होंने चिरन्तन सत्य बताया है; इसलिए उसमें ‘संशोधन’ नहीं करना पडता । इसके विपरीत बुद्धिवादियोंके विज्ञानमें निरन्तर ‘संशोधन’ होते रहते हैं; क्योंकि उनके सिद्धान्त कुछ वर्षके उपरान्त परिवर्तित हो जाते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन […]

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