
हमारे श्रीगुरुने एक बार एक सुन्दर तथ्य कहा था – बुद्धिवादी एवं नेतृत्त्व कुशल साधक जीव यदि साधना करे तो वह शीघ्र ईश्वर प्राप्ति कर सकता है, परन्तु अधिकांशतः ऐसे बुद्धिवादी जिसमें नेतृत्त्वकी क्षमता एवं साधना करनेकी प्रवृत्ति हो, उसमें अहंकार अधिक होनेके कारण उसमें अपने मनानुसार करनेकी प्रवृत्ति होती है, गुरुको समष्टि कार्य हेतु ऐसे बुद्धिवादिकी आवश्यकता होती जो गुरुकी आज्ञापालन बिना मनमें कोई भी संशयके शब्दशः कर सके, नेतृत्त्व कुशल व्यक्तिमें आज्ञापालनका गुण दुर्लभ है, स्वाभाविक है कि ऐसे नम्र साधक जीव इस संसारमें विरले ही होते हैं और जो ऐसे जीव होते हैं उन्हें सद्गुरु, स्वामी विवेकानंद समान आत्माज्ञानी भी बना देते हैं और उनसे महती धर्मकार्य भी करवा लेते हैं ! इतिहासमें ऐसे कई प्रमाण हैं जब ऐसे साधक जीवके मिलनेपर गुरुको विशेष शक्तिपात कर उसे अपनी ओर आकृष्ट करना पडा है !
ऐसे साधक जीवका यदि अध्यात्मिक स्तर ६० % से अधिक हो और उसमें नम्रता हो तो ही वह गुरुकार्य हेतु पूरक होता है ! इससे नीचेके स्तरपर साधकके मनमें अपने गुरुके प्रति विकल्प निर्माण होते रहता है और वह अपने गुरुकी आज्ञाका पालन पूर्ण निष्ठासे नहीं कर पाता है । गुरुकृपाके अखंड प्रवाह हेतु निष्काम एवं निर्विकल्प गुरु आज्ञा अनुरूप गुरुसेवामें लीन रहना होता है तभी गुरु उन्हें ईश्वरीय कार्य हेतु सक्षम बनाते हैं ।
इसके विपरीत अल्प बुद्धिवाले सहज ही शरणागत हो जाते हैं एवं अपनी कर्मठता तथा भावके कारण गुरुकृपा पाकर आत्मज्ञानी भी हो जाते हैं परन्तु वे समष्टिको योग्य प्रकारसे एवं व्यापक स्वरुपमें मार्गदर्शन नहीं कर पाते हैं जो कलियुगके लिए अति आवश्यक है ।
इससे समझमें आता है कि नम्र, तीक्ष्ण बुद्धिवाले सात्विक एवं उच्च स्तरके साधक जीवको ढूंढने हेतु गुरु सर्वत्र विचरण करते हैं या उनकी प्रतिक्षा करते हैं जिसे वे अपने ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य रुपी थाती सौंप सकें –तनुजा ठाकुर (१५.५.२०१४ )
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