॥ एकश्लोकि रामायणम् ॥ आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् । वालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम् ॥ ॥ एकश्लोकि रामायणं सम्पूर्णम् ॥ अर्थ : आरम्भमें प्रभु श्री रामका वनवास गमन, तत्पश्चात् अनुक्रममें स्वर्ण मृगका हनन, सीताका हरण, जटायुका मरण, सुग्रीवसे मित्रता, बालीका संहार, समुद्रका तरण, लंकाका दहन, रावण, कुंभकर्णका हनन, ये हैं, सम्पूर्ण […]
शारदा शारदाम्भोजवदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥ अर्थ : शरत्कालमें उत्पन्न कमलके समान मुखवाली और सब मनोरथोंको देनेवाली , हे शारदा(सरस्वती)! सब सम्पत्तियोंके साथ मेरे मुखमें सदा निवास करें ।
वृन्दावनेश्वरी राधा कृष्णो वृन्दावनेश्वरः । जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ अर्थ : श्रीराधारानी वृन्दावनकी स्वामिनी हैं और भगवान श्रीकृष्ण वृन्दावनके स्वामी हैं; इसलिए मेरे जीवनका प्रत्येक क्षण श्रीराधा-कृष्णके आश्रयमें व्यतीत हो !
महत: परित: प्रसर्पतस्तमसो दर्शनभेदिनो भिदे । दिननाथ इव स्वतेजसा हृदयव्योम्नि मनागुदेहि न: ॥ अर्थ : हे शम्भो ! हमारे हृदयरुपी आकाशमें, आप सूर्यके समान अपने तेजसे चारों ओर घिरे हुए, ज्ञानदृष्टिको रोकने वाले, इस अज्ञानके अन्धकारको दूर करनेके लिए प्रकट हो जाएं । सूर्य जिस प्रकार अपने तेज–प्रकाशसे रात्रिजन्य अन्धकारको दूर कर देता है, उसी […]
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर यत्पूजितं मयादेव परिपूर्णं तदस्तु मे । अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया दासोऽयं इति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम ।। अर्थ : हे देवाधिदेव ! न मन्त्रोंका उच्चारण आता है, न योग्य प्रकारसे कर्मकांडकी कृति(क्रिया) ही कर पाता हूं, न ही भक्ति है, हे प्रभु जब भी मैं आपकी पूजा करूं, आप ही मुझे […]
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः । अर्थ : वासुदेवनन्दन परमात्मा स्वरूपी भगवान श्रीकृष्णको वंदन है, उन गोविंदको पुनः नमन है, वे हमारे कष्टोंका नाश करें !
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं, भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ अर्थ : मैं इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर, उन भगवान रामको बार-बार नमन करता हूं, जो सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा सुख-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले हैं ।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सह्स्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ।। अर्थ : भगवान शंकरने माता पार्वतीसे कहा , “हे सुमुखी ! प्रभु श्रीरामका एक बार नाम लेना विष्णुसह्स्रनामका उच्चारण करने समान है; अतः मैं सदैव मनको लुभाने वाले ‘राम राम’का ध्यान करता हूं ।”
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ अर्थ : हे रघुपति ! मैं सत्य कहता हूं यद्यपि आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) तथापि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है, हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए […]
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् । वटस्य पत्रास्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ।। अर्थ : वटपत्रके मध्य सोये हुए, अपने हस्तकमलद्वारा पदकमलको मुखकमल प्रवेश कराते हुए, बालक कृष्णको मनसे स्मरण करता हूं ।