गुरु, शिष्य एवं साधक

सन्तोंके पास रहनेसे चित्तकी शुद्धि होनेके लिए भाव उत्कृष्ट एवं निर्विकल्प होना आवश्यक !


सन्तोंके पास रहनेसे चित्तकी स्वतः ही शुद्धि होती है । किन्तु उस साधक या शिष्यका भाव उत्कृष्ट एवं निर्विकल्प होना चाहिए जो मात्र कार्यकर्ता समान देह घिसते हैं, अपने गुरुके कृत्योंको अपने अल्प बुद्धिसे विश्लेषण करते हुए उसमें खोट ढूंढते हैं, मनमें बार-बार विकल्प लाते हैं, ऐसे  जीव वर्षों भी यदि सन्त सान्निध्यमें रहे तो […]

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साधना, गुरु या अपने इष्टदेवताके प्रति विकल्प आनेपर क्या करना चाहिए ? (भाग-३)

वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना मध्यमें ही छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है, इसे वे कृपया पढें एवं चिंतन करें, मेरे विचारसे इससे अवश्य ही उन्हें लाभ होगा |


अनेक बार साधकको अपनी परिस्थिति या गुरुके आदेशके विषयमें विकल्प आता है ! जो भी साधक पूरी उत्कंठासे आध्यत्मिक प्रगति हेतु या ईश्वरप्राप्ति हेतु प्रयास आरम्भ करता है तो ईश्वरीय तत्त्व, गुरु तत्त्व या साक्षात श्रीगुरु उसकी परीक्षा लेना आरम्भ……..

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साधना, गुरु या अपने इष्टदेवताके प्रति विकल्प आनेपर क्या करना चाहिए ? (भाग-२)

वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना मध्यमें ही छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है, इसे वे कृपया पढें एवं चिंतन करें, मेरे विचारसे इससे अवश्य ही उन्हें लाभ होगा |


साधना हम जितना ही अधिक निरपेक्ष एवं निर्विकल्प भावसे करते हैं, उतना ही हमें अधिक लाभ होता है | मैंने देखा है कि जैसे व्यवहारिक जगतमें जब किसीकी किसीसे अपेक्षा टूट जाती है तो उस व्यक्तिके प्रति नकारात्मकता निर्माण हो जाती है ! उसीप्रकार साधकमें……..

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साधना, गुरु या अपने इष्टदेवताके प्रति विकल्प आनेपर क्या करना चाहिए ? (भाग -१)

वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है |


वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है….

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शिष्यके ऊपर गुरुका प्रभाव होना स्वाभाविक !


एक व्यक्तिने फेसबुकपर लिखा है कि आपका सब कुछ सनातन संस्थासे मिलता जुलता है, क्या आप उनसे सम्बन्धित हैं ? पुत्रीके ऊपर माताका प्रभाव, पुत्रके ऊपर पिताका प्रभाव और शिष्यके ऊपर गुरुका प्रभाव होना तो स्वाभाविक है ! और शिष्य तो गुरुके पदचिन्होंपर चलनेवालेको कहते हैं, कृतघ्नोंको शिष्य थोडे ही कहते हैं ! मैंने ‘सनातन’द्वारा […]

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गुरुका विशुद्ध हेतु है शिष्यको मायासे मुक्त करना!


गुरुकी सेवा हेतु इस ब्रह्माण्डके सर्व देवी-देवता, रिद्धि-सिद्धियां सभी तत्पर रहती हैं, ऐसे श्रीगुरुके शिष्यको क्या कभी भी कोई भी लौकिक एवं अलौकिक जगतकी वस्तु……….

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प्रत्येक सत्संगके आरम्भमें अपने श्रीगुरुका नाम क्यों लेती हूं ?

कल इन्दौरमें (मध्य प्रदेश) एक व्यक्ति हमें कहीं मिले, वे यू-ट्यूबपर हमारे प्रवचन सुनते रहते हैं, उन्होंने मुझसे मेरा परिचय पूछा एवं धर्मधारा सत्संगकी स्तुति की तथा एक शंका व्यक्त करते हुए कहा, "आप सभी सत्संगके आरम्भमें अपने गुरुका नाम क्यों लेती हैं ?, मुझे तो आपके गुरुके नामका भी स्मरण हो गया है ?" और उन्होंने हमारे श्रीगुरुका नाम भी हमें बताया जिसे सुनकर हमें अत्यधिक आनन्द हुआ, यह प्रश्नको और एक दो जिज्ञासुओंने पूछा है तो ऐसा सभी लोगोंके इस शंकाका समाधान हो इसलिए इस प्रश्नका उत्तर सार्वजनिक कर बता रही हूं -


हमारी संस्थाका एक मूल उद्देश्य है गुरु परम्पराकी पुनर्स्थापना करना, जैसे पूर्वकालमें प्रत्येक कुलके कुलदेवता और कुलगुरु होते थे, जो उस कुलके लोगोंका स्थूल और सूक्ष्म कल्याण करते थे…..

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आजके सुप्रसिद्ध गुरुओंके उत्तर मात्र मानसिक स्तरके होना!


कुछ आजके सुप्रसिद्ध गुरुओंके भक्तोंद्वारा पूछे गए प्रश्नोंके उत्तर सुनकर अत्यधिक आश्चर्य होता है, उनके उत्तरमें अध्यात्म और धर्म कहीं होता ही नहीं है, उनके उत्तर मात्र मानसिक स्तरके होते हैं !

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साधकके गुण (भाग- १६)


अपने सह-साधकोंसे द्वेष न करना
द्वेष करना, यह षड्रिपुओंमेंसे एक मुख्य रिपु है । साधनाके मध्य अनेक बार कुछ साधक अपने सह-साधकोंसे कुछ वीशिष्ट कारणोंसे द्वेष करने लगते हैं, ऐसेमें अनेक बार उनसे जाने-अनजाने पापकर्म हो जाते हैं, जिससे उनकी साधनाका क्षरण होता है…..

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साधकके गुण (भाग- १५)


सतत ईश्वर व गुरुसे अनुसन्धान रखनेवाला
साधकका मूल उद्देश्य अपने गुरु या ईश्वरसे एकरूप होना होता है; अतः वह जहां भी हो, जिस परिस्थितिमें भी हो, वह अपना अनुसन्धान ईश्वर या गुरुसे बनाए रखने हेतु प्रयत्नशील …..

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