गुरु, शिष्य एवं साधक

हमारे श्रीगुरुका द्रष्टापन


         सनातन संस्थाकी एक पूर्णकालिक साधक दम्पतिकी पुत्रीको उच्च शिक्षा अन्तर्गत चिकित्सकीय क्षेत्रमें जानेकी इच्छा थी । वह एलोपैथी हेतु प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओंकी पूर्वसिद्धता करनेका सोच रही थी । हमारे श्रीगुरुने उस साधक युवतीसे कहा कि एलोपैथीका कोई भविष्य नहीं है, और आनेवाले कालमें सर्वत्र आयुर्वेदका ही प्रचलन होगा; इसलिए वे उच्चशिक्षा अन्तर्गत […]

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गुरुकी भक्ति शिष्यके कृत्यसे झलकती है !


आपको हमने परशुराम जन्मस्थलीके सन्त बद्री बाबाके विषयमें बताया ही है । बाबाकी गुरुके प्रति निष्ठा कैसी है ? यह उनके साथ वार्तालापमें ज्ञात हुआ । एक दिवस वे बात ही बातमें कह रहे थे कि मैंने कुछ विशेष नहीं किया । मेरे गुरुने एक बार मुझे कहा था कि मैं तो अब जानापाव नहीं […]

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कार्यकर्ता, जिज्ञासु, साधक, अच्छे साधक एवं शिष्य !


सबसे शीर्षपर होता है शिष्य – जो अपना सर्वस्व गुरुको अर्पण कर मात्र गुरुकार्य हेतु ही जीवित रहता है उसे शिष्य कहते हैं, ऐसे शिष्य पूर्णकालिक साधक होते हैं ! उनके लिए गुरु आज्ञा वेद-वाक्य होता है …..

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धर्मधारा


खरे संतोंके पास तो हम नग्न समान होते हैं उन्हें हमारा अगला-पिछला सर्वकर्म ज्ञात होता है कुछ व्यक्ति अनेक संतोंसे संपर्क ( जिसे अंग्रेजीमें public relation maintain करना कहते हैं ) बनाए रखते हैं और अपनी इस कृतिकी डींगें सर्वत्र हांंकते फिरते हैं ! खरे संतोंके पास तो हम नग्न समान होते हैं उन्हें हमारा […]

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धर्मधारा


आइए जाने किसकी शुभकामनाएं सदैव ही फलीभूत होती है और क्यों ? एक बार एक शिष्यने गुरुसे पूछा, “मेरे एक शुभचिन्तकने जो मुझसे अत्यधिक स्नेह करते हैं, उन्होंने मुझे प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षामें जाते समय कहा था कि इस बार मैं अवश्य ही उत्तीर्ण हो जाऊंगा, परन्तु दो वर्षके समान इस बार भी बहुत प्रयास करनेपर भी […]

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धर्मधारा


एक व्यक्तिने कहा कि हमारे गुरुने कहा था कि फलां साधक २०१२ तक सन्त पदपर आ जायेगा; किन्त उसने तो साधना ही छोड दी ! मेरे श्रीगुरुके बताई सब बातें सत्य हुई हैं यह कैसे असत्य हो गया ? सन्त वर्तमान कालमें रहते हैं एवं किसी भी साधकके विषयमें ऐसी बातें उसके उस समयके क्रियमाण […]

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सन्तोंके पास रहनेसे चित्तकी शुद्धि होनेके लिए भाव उत्कृष्ट एवं निर्विकल्प होना आवश्यक !


सन्तोंके पास रहनेसे चित्तकी स्वतः ही शुद्धि होती है । किन्तु उस साधक या शिष्यका भाव उत्कृष्ट एवं निर्विकल्प होना चाहिए जो मात्र कार्यकर्ता समान देह घिसते हैं, अपने गुरुके कृत्योंको अपने अल्प बुद्धिसे विश्लेषण करते हुए उसमें खोट ढूंढते हैं, मनमें बार-बार विकल्प लाते हैं, ऐसे  जीव वर्षों भी यदि सन्त सान्निध्यमें रहे तो […]

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साधना, गुरु या अपने इष्टदेवताके प्रति विकल्प आनेपर क्या करना चाहिए ? (भाग-३)

वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना मध्यमें ही छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है, इसे वे कृपया पढें एवं चिंतन करें, मेरे विचारसे इससे अवश्य ही उन्हें लाभ होगा |


अनेक बार साधकको अपनी परिस्थिति या गुरुके आदेशके विषयमें विकल्प आता है ! जो भी साधक पूरी उत्कंठासे आध्यत्मिक प्रगति हेतु या ईश्वरप्राप्ति हेतु प्रयास आरम्भ करता है तो ईश्वरीय तत्त्व, गुरु तत्त्व या साक्षात श्रीगुरु उसकी परीक्षा लेना आरम्भ……..

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साधना, गुरु या अपने इष्टदेवताके प्रति विकल्प आनेपर क्या करना चाहिए ? (भाग-२)

वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना मध्यमें ही छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है, इसे वे कृपया पढें एवं चिंतन करें, मेरे विचारसे इससे अवश्य ही उन्हें लाभ होगा |


साधना हम जितना ही अधिक निरपेक्ष एवं निर्विकल्प भावसे करते हैं, उतना ही हमें अधिक लाभ होता है | मैंने देखा है कि जैसे व्यवहारिक जगतमें जब किसीकी किसीसे अपेक्षा टूट जाती है तो उस व्यक्तिके प्रति नकारात्मकता निर्माण हो जाती है ! उसीप्रकार साधकमें……..

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साधना, गुरु या अपने इष्टदेवताके प्रति विकल्प आनेपर क्या करना चाहिए ? (भाग -१)

वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है |


वर्तमान कालमें अनेक साधकोंको अपने आराध्य या गुरुके प्रति विकल्प आता है, और वे साधना छोड देते हैं, यह लेख श्रृंखला ऐसे साधकों या भक्तोंके लिए है….

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