गुरु, शिष्य एवं साधक

प्रत्येक सत्संगके आरम्भमें अपने श्रीगुरुका नाम क्यों लेती हूं ?

कल इन्दौरमें (मध्य प्रदेश) एक व्यक्ति हमें कहीं मिले, वे यू-ट्यूबपर हमारे प्रवचन सुनते रहते हैं, उन्होंने मुझसे मेरा परिचय पूछा एवं धर्मधारा सत्संगकी स्तुति की तथा एक शंका व्यक्त करते हुए कहा, "आप सभी सत्संगके आरम्भमें अपने गुरुका नाम क्यों लेती हैं ?, मुझे तो आपके गुरुके नामका भी स्मरण हो गया है ?" और उन्होंने हमारे श्रीगुरुका नाम भी हमें बताया जिसे सुनकर हमें अत्यधिक आनन्द हुआ, यह प्रश्नको और एक दो जिज्ञासुओंने पूछा है तो ऐसा सभी लोगोंके इस शंकाका समाधान हो इसलिए इस प्रश्नका उत्तर सार्वजनिक कर बता रही हूं -


हमारी संस्थाका एक मूल उद्देश्य है गुरु परम्पराकी पुनर्स्थापना करना, जैसे पूर्वकालमें प्रत्येक कुलके कुलदेवता और कुलगुरु होते थे, जो उस कुलके लोगोंका स्थूल और सूक्ष्म कल्याण करते थे…..

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आजके सुप्रसिद्ध गुरुओंके उत्तर मात्र मानसिक स्तरके होना!


कुछ आजके सुप्रसिद्ध गुरुओंके भक्तोंद्वारा पूछे गए प्रश्नोंके उत्तर सुनकर अत्यधिक आश्चर्य होता है, उनके उत्तरमें अध्यात्म और धर्म कहीं होता ही नहीं है, उनके उत्तर मात्र मानसिक स्तरके होते हैं !

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साधकके गुण (भाग- १६)


अपने सह-साधकोंसे द्वेष न करना
द्वेष करना, यह षड्रिपुओंमेंसे एक मुख्य रिपु है । साधनाके मध्य अनेक बार कुछ साधक अपने सह-साधकोंसे कुछ वीशिष्ट कारणोंसे द्वेष करने लगते हैं, ऐसेमें अनेक बार उनसे जाने-अनजाने पापकर्म हो जाते हैं, जिससे उनकी साधनाका क्षरण होता है…..

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साधकके गुण (भाग- १५)


सतत ईश्वर व गुरुसे अनुसन्धान रखनेवाला
साधकका मूल उद्देश्य अपने गुरु या ईश्वरसे एकरूप होना होता है; अतः वह जहां भी हो, जिस परिस्थितिमें भी हो, वह अपना अनुसन्धान ईश्वर या गुरुसे बनाए रखने हेतु प्रयत्नशील …..

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साधकके गुण (भाग-१३)


मुमुक्षुत्वका होना
साधनाका पथ बहुत ही कठिन पथ होता है, इसे आप कांटोंभरा पथ भी कह सकते हैं, इसलिए इस पथपर चलने हेतु दृढता यह गुण तो अति आवश्यक है; किन्तु मन दृढ तभी रहता है जब अपने लक्ष्यको पानेकी तीव्र उत्कंठा….

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साधकके गुण (भाग- १४)


सहसाधकसे अपने चूकें पूछ कर लेना और यदि वह चूकें बताए तो उन्हें सहजतासे स्वीकार करना
जो साधक एकाकी साधना करता है, उसकी अपेक्षा जो सह-साधकोंसे साथ रह कर साधना करता है, उसकी प्रगति अधिक शीघ्र होती है; इसीलिए आश्रमका निर्माण सन्त करते हैं जिससे……

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साधकके गुण (भाग-१२)


वैदिक संस्कृति अनुसार आचरणसे व्यक्ति सत्त्व गुणकी ओर शीघ्र बढता है जिससे उसके लिए साधना करना सरल हो जाता है ! अतः साधकका वर्तन वैदिक संस्कृति अनुकूल होना चाहिए…….

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साधकके गुण (भाग – ११)


गुरु या ईश्वरके प्रति निर्विकल्प रहना
साधनाके पथपर श्रद्धा और भावका अत्यधिक महत्त्व होता है, वस्तुत: गुरुतत्त्व या ईश्वरीय तत्त्व साधककी भक्ति अनुरूप ही कार्य करता है | अनेक बार हमें लगता है कि समाज या अन्य व्यक्ति…..

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साधकके गुण (भाग-१०)


धर्म एवं अध्यात्मके सीखे हुए तथ्योंको व्यवहारमें लाना

साधकका एक महत्त्वपूर्ण गुण होता है कि उसकी कथनी और करनीमें अन्तर नहीं होता ! उसमें सीखनेकी वृत्ति बहुत अधिक होती है……

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साधकके गुण (भाग-९)


किसी भी सेवाके लिए सदैव तत्पर रहना

गुरु या ईश्वरको यह ज्ञात होता है कि हमारी आध्यात्मिक प्रगति हेतु कौनसी सेवा पूरक होगी और वे उसीप्रकारकी सेवा हमें देते हैं ! सेवा, गुरु या ईश्वरको प्रसन्नकर उनकी कृपा पानेका एक सरल……

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