गुरु, शिष्य एवं साधक

गुरु या सन्त किसे नहीं मिलते हैं ? (भाग – २)


गुरुप्राप्ति हेतु सबसे आवश्यक घटक है शिष्यके गुणवाला होना | यदि यह गुण न हो तो गुरुप्राप्ति कभी नहीं हो सकती है | शिष्यके गुण प्रगत अवस्थाके साधकोंमें होता है, इसलिए प्रथम साधक तत्पश्चात………

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गुरु या सन्त किसे नहीं मिलते हैं ? (भाग – १)


अति बुद्धिवादीको गुरु नहीं मिलते हैं !
  जो व्यक्ति अपनी बुद्धिका आवश्यकतासे अधिक उपयोग करते हैं, वे सन्तोंको भी बुद्धिसे समझनेका ‘निरर्थक’ प्रयास ही नहीं करते हैं, मैंने तो देखा है वे बिना साधनाके आधारके या बिना शास्त्रोंको आत्मसात किए, सन्तोंसे वाद-विवाद…..

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गुरुसेवकका पद इस ब्रह्माण्डका सर्वोच्च पद !


गुरुसेवकका पद इस ब्रह्माण्डका सर्वोच्च पद होता है, उसे पानेके पश्चात कुछ भी पानेके इच्छा शेष नहीं रहती है | गुरुसेवामें लीन रहनेमें जो आनंद आता है वह किसी भी योगमार्ग से साधना करनेपर नहीं आता है, यह अवस्था एक प्रकारसे जागृत समाधिकी होती है और……..

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कुछ लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या आपके गुरुने आपको गुरुमंत्र दिया है ? 


हमारे गुरु किसीको गुरुमन्त्र नहीं देते हैं, वे यदि किसीको अति आवश्यक हो तो अवश्य ही कुछ विशेष जप बताते हैं; किन्तु सामान्यत: हमारे श्रीगुरुके यहां गुरुमंत्र देनेकी पद्धति….

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साधक किसे कहते हैं ? (भाग – १०)


साधकत्व एवं त्यागका सीधा सम्बन्ध होता है । जिसमें त्यागकी वृत्ति जितनी अधिक होती है, वह उतना ही अच्छा साधक होता है । साधक, अपने तन, मन, धन, प्राण, बुद्धि और अहंंका  अत्यन्त सहजतासे ईश्वरप्राप्ति, धर्मरक्षण या गुरुकार्य….

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साधक किसे कहते हैं ? (भाग – ९)


जब कोई स्वयंप्रेरित होकर नियमित तन, मन, धन, बुद्धि और अहंका त्यागकर, निष्काम भावसे मात्र ईश्वरीय कृपा सम्पादन करने हेतु अनेक वर्ष बिना किसी बाह्य प्रोत्साहनके साधना करता है तो उसे साधक कहते हैं । जबतक साधनाके…..

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साधक किसे कहते हैं ? (भाग – ८)


वाचालता, यह एक दुर्गुण है । साधनाकालमें अन्तर्मुख होने हेतु मितभाषी होना या जितना आवश्यक हो उतना बोलना, अति आवश्यक होता है । आज अनेक लोग जो थोडी-बहुत साधना करते हैं, वे अपनी साधनासे अर्जित शक्तिको अनावश्यक…..

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साधक किसे कहते हैं ? (भाग – ६)


साधकत्वके गुणोंको शीघ्रतासे विकसित करने हेतु या आत्मसात करने हेतु समष्टिमें रहना अधिक पोषक सिद्ध होता है । समष्टिमें रहनेका एक उत्तम साधन है, किसी सन्तके आश्रममें रहना । जब हम आश्रममें रहते हैं तो जो साधक हमसे…..

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साधक किसे कहते है ?  (भाग – ४)


सत्सेवासे (सन्त कार्य या ईश्वरीय कार्य या धर्मकार्य) ईश्वरीय कृपाका सम्पादन होता है;  अतः अध्यात्मिक प्रगतिमें इसका विशेष महत्त्व है । सेवा, बडी या छोटी, प्रमुख या गौण नहीं होती है; सेवा, सेवा होती है; अतः सत्सेवाके मध्य जो……

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साधक किसे कहते हैं ?  (भाग – ५)


गुरु या ईश्वरके प्रति प्रत्येक परिस्थितिमें निर्विकल्प रहनेवाला ही साधक कहलानेका अधिकारी होता है । संस्कृतमें एक सुवचन है, ‘ईश्वरं यत् करोति शोभनम् करोति’ अर्थात ईश्वर जो करते हैं, वह अच्छा ही करते हैं । गुरु, ईश्वरके प्रतिनिधि……

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