राजनेता प्रजाके मध्यसे ही चुने जाते हैं; अतः योग्य राज्यकर्ताओंने निर्माण हेतु प्रजाके भीतर आंतरिक सुधार करना अपेक्षित है और वह धर्मशिक्षण और साधनासे ही संभव है !
जिस लोकतंत्रमें राज्यकर्ताओंको लोकतान्त्रिक पद्धतिसे चुननेमें मरने-मारनेकी स्थिति निर्माण हो, क्या उसे लोकतंत्र कहा जा सकता है ? यह तो मारकाट तंत्र है !!
प्रशासनिक अधिकारीका पदभार सम्भालनेसे पूर्व एक निर्धारित कालावधितक प्रशिक्षण दिया जाता है; किन्तु उनपर शासन करे, ऐसे राजनेता बनने हेतु किसी भी प्रशिक्षणकी आवश्यकता नहीं होती है…
पूर्व कालमें कलाकार देवी-देवता, सन्त-गुरुकी अराधनाकर अपनी कलाका प्रदर्शन किया करते थे । आज स्थिति पूर्णत: विपरीत है । आजके कलाकारके पास साधना और भावका आधार न होनेके कारण, न ही वे व्यासपीठकी गरिमाको……
१. हमारा १९० देशोंसे व्यापारिक सम्बन्ध है, उसमें सबसे बडा व्यापारिक साझेदारचीन हो गया है । उसमें भी भारतसे केवल ९ बिलियन डालरका सामान जाता है और चीनसे आता है और ६१.८ बिलियन डालर अर्थात् ५२.८ बिलियनका घाटा प्रतिवर्षजो रुपयोंमें ३५४२ अरब रुपये बनता है । २.हमारे कुल विदेशी घाटेका ४४% मात्र चीनसे है ।यदि […]
अनादिकालसे हमारा देश कृषि प्रधान देश रहा है । जब इस देशका किसान समृद्ध था तब यह देश ‘सोनेकी चिडिया’ कहलाता था । मुसलमान आक्रान्ताओंने इस देशके किसानोंपर करोंका बोझ लादनेका क्रम आरम्भ किया और उसके पश्चात् अंग्रेजोंके उत्पीडनने किसानोंकी स्थिति और विकट कर दी; किन्तु स्वतन्त्रता पश्चात् किसानोंकी स्थितिमें कोई भी सुधार नहीं हुआ […]
१. हमारी पक्षपाती प्रसारवाहिनियां आए दिन गिरिजाघरके पादरियोंद्वारा बाल यौनशोषणके वृत्त, वैश्विक स्तरपर प्रकाशित होते रहते हैं; किन्तु हमारी धर्मनिरपेक्ष प्रसारवाहिनियां इसपर मौन साधे रहती हैं ! इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु, इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्थाको हटाकर, धर्म सापेक्ष हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अनिवार्य हो गया है; जहां प्रसारवाहिनियां प्रत्येक वृत्तको निष्पक्ष होकर उसकी सत्यताको […]
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् इति ते संशयो मा भूत् राजा कालस्य कारणं । अर्थात् राजा ही कालका कारण होता है, अर्थात् राजाकी पात्रता अनुरूप काल होता है । रामावतार त्रेतायुगमें हुआ और शास्त्र अनुसार त्रेतायुगमें धर्मके तीन चरण व्याप्त रहता है; …….
एक व्यक्तिने मेरे लेखोंपर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि आपके लेखोंमें आक्रामकताकी झलक दिखाई देती हैं ! मृतवत हिन्दू समाजको जागृत करने हेतु जिस भी प्रकारके लेखोंकी आवश्यकता है, वह मैं लिखती हूं, अब आप इसे जो समझना चाहें, समझ सकते हैं ! राष्ट्र और धर्मके प्रत्येक अवययपर हो रहे आघातको मुखर होकर विरोध […]
संतोंपर निराधार आरोप लगाकर उन्हें कारागृहमें रखनेवाले यह नहीं जानते कि इससे उनके पापका घडा शीघ्र भर रहा है और उसके पश्चात् ईश्वरीय विधान अनुसार उन्हें कठोर दण्ड मिलेगा ही ! दुर्जनोंके विनाश और साधकोंके रक्षण संबंधी अनेक प्रत्यक्ष घटनाओंसे भी दुर्जन सीखते नहीं और डरते नहीं, सचमें इसे ही ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ कहते […]