को बड छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू ॥
देखि अहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥2॥ – बाल कांड , रामचरितमानस
अर्थ : इन (नाम और रूप) में कौन बडा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है…..
रामचरितमानसमें गोस्वामी तुलसी दासजीने दुर्जन प्रवृत्तिके व्यक्तिको भी नमन किया है; परंतु विशेष बात यह है कि उन्होने दुर्जनोंकी विशेषता बताई है , प्रत्येक व्यक्तिने अतर्मुख होकर इसे पढना चाहिए और अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि कहीं अंशमात्र भी हमारे अंदर वैसी आसुरी प्रवृत्ति तो नहीं है…
ईश्वर निर्गुण और निराकार हैं उस निराकार तक पहुंचानेका कार्य, सगुण प्रभुके नाम, सहज ही करता है। वस्तुतः ईश्वर गुप्त है और ईश्वरका नाम प्रकट है , नाम लेते लेते नामधारी नामके कारण गुप्त ईश्वरसे एकरूप हो जाता है और नाम लेनेके कारण भक्तवात्सल भगवान् नामधारकके निकट आ जाते हैं……
यथा यथा ही पुरुष: कल्याणे कुरुते मन: । तथा तथाsस्य सर्वार्था: सिद्धयंते नात्र संशय: ।। – विदुर नीति
अर्थ : जैसे-जैसे पुरुष मनको शुभ कार्योंमें लगाता है, वैसे-वैसे उसके सभी अर्थ, पूर्ण हो जाती हैं, इसमें अंशमात्र भी संदेह नहीं है।
वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कान्याकाम । रूपवति न नीचस्य विवाह: सदृश्ये कुले ।। – चाणक्य नीति
अर्थ : बुद्धिमान पुरुषने ऐसे कन्यासे अवश्य विवाह करना चाहिए जो यद्यपि देखनेमें कुरूप हो….
सत्यस्य वचनं श्रेय: सत्यादपि हितं वदेत् । यद्भूतहितमत्यन्तं अेतत् सत्यं मतं मम ।। – महाभारत, शांतिपर्व
अर्थ : सत्य वाचन श्रेष्ठ है और सत्य भी ऐसा सबका हित हो….
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥3॥
भावार्थ :-दोनों (संत और असंत) जगतमें एक साथ जन्म लेते हैं; परन्तु कमल और जोंकके समान उनके गुण भिन्न-भिन्न होते हैं….
सा रसना ते नयने तामेव करौ स एव कृतकृत्यः । या ये यौ यो भर्गं वदतीक्षेते सदार्चतः स्मरति ॥ – शिवानन्दलहरी
अर्थ : वह जीभ नहीं यदि वह सतत हरि सुमिरन न करे | वह नेत्र नहीं जो सभीमें ईश्वरके स्वरूपका दर्शन न कर पाए….
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
यो वैयुवाsप्यधीयानस्तं देवा: स्थविरम् विदुः।। – मनुमृति (२:१५९)
अर्थ : व्यक्तिके केश श्वेत हो जानेसे वह बडा या श्रेष्ठ नहीं होता अर्थात् आदरणीय
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ।।