हमारे श्रीगुरुने एक बार बहुत अच्छी बात कही थी कि साधकका कोई अधिकार नहीं होता, मात्र कर्तव्य होता है । आज यदि समाजका प्रत्येक विद्यार्थी, इस तथ्यको बाल्यकालमें ही अंगीकृत कर ले तो इस समाजका कायाकल्प………..
इस संसारमें चार प्रकारके लोगोंको ईश्वर चाहिए होता है, एक वह है जो बहुत दुःखी होता है और उसके पास अपने दुःखोंको दूर करनेका एक मात्र साधन ईश्वर होते हैं, ऐसे लोग मायासे दुत्कारे जानेपर ईश्वरकी शरणमें आते हैं । दूसरी श्रेणीमें और अधिक सुख, ऐश्वर्य, धन-सम्पत्तिके इच्छुक भोगी लोग होते हैं, उन्हें ज्ञात होता […]
आजका विद्यार्थी ही कलका गृहस्थ बनता है । यदि ब्रह्मचर्य आश्रममें (विद्यार्थी जीवनमें) दोष निर्मूलन प्रक्रिया सिखाई जाए तो ऐसे विद्यार्थियोंका जीवन सुखी होगा और वे अच्छे पति या पत्नी, माता या पिता, दादा या दादी सिद्ध होंगे…….
युवाओंमें बढनेवाले मनोरोगोंके लिए भी स्वभावदोष ही उत्तरदायी : वर्तमान समयमें युवा वर्गमें विशेषकर आधुनिकतामें लिप्त रहनेवाले युवाओंमें मनोरोग एक महामारीके रूपमें फैल रहा है । इतना ही नहीं प्रतिदिन कहीं न कहीं युवाओंद्वारा ……
मनकी एकाग्रता हेतु दोष निर्मूलनकी आवश्यकता : मनमें जितने अधिक विषय-वासनाओंके संस्कार होते हैं, मनमें उतने ही अधिक विचार होते हैं और इससे मनकी एकाग्रता न्यून होती है……
कुछ दिवस पूर्व इन्दौरमें एक व्यक्ति जो मेरे लेखोंका सम्भवत: वाचन करते हैं, उन्होंने अपनी बहनके सामने मेरा परिचय देते हुए कहा, “ये वही हैं जो ‘व्हाट्सएप्प’पर प्रतिदिन लम्बे-लम्बे लेख लिखती हैं ।” वे अपनी बहनको हमारे लेख प्रतिदिन प्रेषित करते हैं ! मैंने उनकी बहनसे पूछा, “क्या आप हमारे ‘लम्बे-लम्बे’ लेख ‘व्हाट्सएप्प’पर पढती हैं ! […]
आज अधिकांश व्यक्ति कुछ न कुछ साधना तो करते हैं; परन्तु धर्मशिक्षणके अभावमें योग्य साधना नहीं करते; फलस्वरूप साधना करनेपर जितनी आध्यात्मिक प्रगति होनी चाहिए उतनी नहीं होती है । आज अधिकांश हिन्दुओंकी स्थिति ऐसी है कि जैसे बायां हाथ टूटा हो और दाहिने हाथमें ‘प्लास्टर’ लगाकर कर घूम रहे हैं और कह रहे हों […]
कलियुगमें भक्तियोग अनुसार साधना करना अधिक सरल है; क्योंकि आजके कालके लिए यह सर्वथा उपयुक्त साधना पद्धति है ! अन्य योगमार्गोंकी तुलनामें इस योगमार्गके गुरु अधिक सुलभतासे प्राप्त होते हैं और भक्तिमार्ग तमोगुणी जीव भी सहजतासे कर सकता है और यही भक्ति उसकी सात्त्विकताको बढाती है जो अंतत: उसे त्रिगुणातीत बनाती है ।
पति या पत्नीने, एक दूसरेकी साधनामें अवरोध निर्माण नहीं करना चाहिए ! इससे वे महापापके भागी होते हैं और इससे लेन-देन (नूतन कर्मफल या संचित) निर्माण होते हैं, जो जन्म-जन्मान्तर चलते हैं…..
कलियुगमें हमारी साधना ‘देवासुर संग्राम’ समान सदैव रहेगी । कभी हमारे अन्दर विद्यमान आसुरी प्रवृत्तियोंके (स्वभावदोष और अहंके लक्षणोंके) साथ तो कभी सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियोंके साथ तो कभी बाह्य जगतके दुर्जनोंके साथ । जो साधक, इस मूलभूत तत्त्वको समझकर योग्यप्रकारसे साधना करेगा, उसे ही पूर्णत्वकी प्राप्ति (ईश्वरसे पूर्ण एकरूपता) हो सकती है । अन्य […]