सतत सूक्ष्म स्तरके अनिष्ट आक्रमणोंके कारण देह अब इतनी अशक्त हो गई है कि अब बाहर जाकर प्रसार करना कठिन हो गया है; इसलिए एक ही स्थानपर बैठकर क्या करूं कि समाज साधनारत हो…..
एक आनन्दकी बात बताती हूं, ‘उपासना’के नूतन उपक्रम, ‘सूक्ष्म इन्द्रियोंको कैसे जागृत करें’, इस प्रक्रिया सीखने हेतु कुछ विनम्र शिक्षकगण जिज्ञासा दिखाने लगे हैं और वे इस दिशामें प्रयास भी करने लगे हैं, जो बहुत अच्छा संकेत हैं । यदि आजका शिक्षक वर्ग धर्मनिष्ठ हो जाए तो अगली सात्त्विक पीढीका निर्माण सरलतासे होने लगेगा । […]
आज हिन्दुओंमें कर्तापनकी भावना अत्यधिक बढ गई है; इसीलिए आज अनेक हिन्दू कुटुम्बके मुखियाको मात्र अपने चार सदस्योंवाले कुटुम्बको (दो सन्तानवाले परिवारको) पालन-पोषण करनेमें तनाव आता है । वहीं पूर्वकालमें सौ सदस्योंवाले कुटम्बके मुखिया आनन्दी रहते थे…..
वर्ष २०११ में ही ईश्वरसे आदेश हुआ कि लेखन आरम्भ करो । हमारे श्रीगुरुके श्रीगुरुकी गद्दीपर इन्दौर स्थित आश्रममें आसीन रामानन्द महाराज, ‘वैदिक उपासना पत्रिका’के विशेषांक, जो ‘मासिक’से पूर्व छपते थे, उसके लेखको देखकर बहुत प्रसन्न होते थे…..
सन्तोंका अहं नष्ट हो चुका होता है; इसीलिए उनके देहमें रहते हुए भी हम उनके छायाचित्रपर माला चढाकर उन्हें पूजते हैं; अतः साधको, अपने दोष एवं अहंको नष्ट करने हेतु संकल्पबद्ध होकर प्रयास करें ! विश्वास करें, चिरन्तन आनन्दकी अनुभूतिके साथ ही आपका यश शाश्वत हो जाएगा एवं आप सम्पूर्ण जगतमें पूजे जाएंगे !
कुछ लोग ‘क्रियायोग’के अनुसार साधना करते हैं; क्रियायोगकी साधना कभी भी अपने मनसे या ग्रन्थ पढकर या किसीसे सुनकर या कहींसे देखकर, कभी नहीं करनी चाहिए ! इस योगमार्गके अनुसार साधना मात्र योग्य गुरुके शरणमें रहकर ही सीखना चाहिए, अन्यथा अनर्थ भी हो सकता है; क्योंकि यह सब छ: सूक्ष्म चक्रोंके जागृत करने सम्बन्धी शास्त्र है…..
यदि कुछ ध्यानमार्गियोंको प्रकाश दिखाई देता है और ध्यानमें कुछ क्षण एकाग्रता अनुभव होता है तो उन्हें लगता है कि उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया । तो ध्यान रखें, जब जागृत अवस्थामें भी आपका मन निर्विचार रहने लगता है और आसपासके प्रतिकूल प्रसंग आपके मनको विचलित नहीं करे ……
कुछ ज्ञानमार्गी मुझसे कहते हैं कि वे ‘सोऽहं’ भावमें अधिक समय नहीं रह पाते हैं । ‘सोऽहं’ भाव या ‘अहम् ब्रह्म अस्मि’के भावमें अधिक समय रहने हेतु हमारा आध्यात्मिक स्तर ‘कमसे कम’ ७० % प्रतिशतसे अधिक होना अनिवार्य है……
ख्रिस्ताब्द २०१२ में धर्मयात्राके मध्य जम्मू-कश्मीर भी जाना हुआ । वहां एक दिवस जम्मूमें एक विस्थापित कश्मीरी पण्डितके घर भोजन करते समय मैंने सहज ही उनकेद्वारा बनाए दम-आलूकी प्रशंसा की तो वहां उपस्थित एक कश्मीरी पण्डित कहने लगे, “यह तो कुछ नहीं, आप हमारे यहां विवाहके भोजपर आएं, उसमें हम तो अपनी आर्थिक क्षमता अनुरूप पांचसे इक्कीस प्रकारके मांसाहार पकाते हैं ।”……
पूर्व कालमें गृहस्थ ५०-६० वर्षकी आयुके पश्चात अपनी सारे उत्तरदायित्वको अपनी युवा पीढीको सौंप साधनाको प्रधानता दिया करते थे । आजकल धर्मशिक्षणके अभावमें सेवानिवृत्त होनेके पश्चात कुछ व्यक्ति ‘हंसोड संस्थान’में (लाफ्टर क्लब) सहभागी होते है…..